वफ़ा का बिल चुकाना भी नहीं आता
ख़फ़ा से दिल लगाना भी नहीं आता
दिया था घाव तूने ख़ास जिस दिल पर
निशाँ उसका दिखाना भी नहीं आता
मकाँ अच्छा नहीं था पर बना मेरा
ज़माने को भगाना भी नहीं आता
मिला कैसे तुझे हर फ़न बता मुझको
मुझसे सुनना सुनाना भी नहीं आता
ज़मीं पर बैठकर अच्छा हँसाते थे
मगर अब ग़म उठाना भी नहीं आता
बदलते आज की ख़ातिर बदलते हम
सदी में सन बढ़ाना भी नहीं आता
जिसे तुम क़त्ल करने रोज जाते हो
हमें उसको बचाना भी नहीं आता
ख़िज़ाँ के ज़ख़्म भरते भी नहीं जल्दी
हमें मरहम लगाना भी नहीं आता
किसे हमको बचाना है बता दो तुम
दवा सबको खिलाना भी नहीं आता
किनारे पे समंदर के रवाँ लहरें
बिखरता दिल उठाना भी नहीं आता
सदाएँ गूँजती आमान में तेरी
हमें क़िस्सा सुनाना भी नहीं आता
बता 'आसिफ़' हमारी शायरी का तुक
लिखा मक़्ता' मिटाना भी नहीं आता
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