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Top 10 of Davarka Das Shola

Davarka Das Shola

Top 10 of Davarka Das Shola

    ऐ बे-नियाज़-ए-शौक़-ए-फ़रावाँ कहाँ है तू
    ऐ निगहत-ए-शमीम-ए-बहाराँ कहाँ है तू
    ऐ बाइ'स-ए-फ़रोग़-ए-गुलिस्ताँ कहाँ है तू
    ऐ रौनक़-ए-वजूद-ए-ख़याबाँ कहाँ है तू
    पथरा गई हैं आँखें तिरे इंतिज़ार में
    कुछ तो बता कि ऐ मह-ए-ताबाँ कहाँ है तू
    वो तेरे शौक़-ए-नग़्मा-सराई को क्या हुआ
    ऐ यार नग़्मा-रेज़-ओ-ग़ज़ल-ख़्वाँ कहाँ है तू
    तेरे बग़ैर कुछ नहीं लुत्फ़-ए-शराब-ओ-शे'र
    ऐ निगहत-ए-लतीफ़-ए-ख़याबाँ कहाँ है तू
    हाँ तेरे दम से रौनक़-ए-बज़्म-ए-वजूद थी
    ऐ रौशनी-ए-शम-ए-फ़रोज़ाँ कहाँ है तू
    तेरे बग़ैर ख़ाक-बसर फिर रहा हूँ मैं
    मेरे बग़ैर सर-ब-गरेबाँ कहाँ है तू
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    बेचारी के आराम की सूरत ही कहाँ है
    बेवा की जवानी भी अजब आफ़त-ए-जाँ है
    मुमकिन है कि पीरी में सुकूँ पा सके वर्ना
    जब तक वो जवाँ है ग़म-ए-शौहर भी जवाँ है
    ममता से है मजबूर कि औलाद की ख़ातिर
    जीती है मगर जीना ब-हर-रंग गराँ है
    ख़ूँ-गशतगी-ए-दिल की दवा हो नहीं सकती
    क्या ख़ाक थमें ख़ूँ कि जो आँखों से रवाँ है
    बे-लौस मोहब्बत का सिला दाइमी फ़ुर्क़त
    ऐ साहब-ए-इंसाफ़ ये इंसाफ़ कहाँ है
    दिल टूट तो सकता है मगर जुड़ नहीं सकता
    अब ये भी अजब सिलसिला शीशा-गराँ है
    फ़रियाद करे भी तो करे किस से कि आख़िर
    फ़रियाद की क़ीमत न यहाँ है न वहाँ है
    ये मल्गजी चादर ये लबादा शिकन-आलूद
    अल्लाह न करे तू कहीं बेवा तो नहीं है
    भर आई हुई आँखों में ठहरे हुए आँसू
    ये नीची नज़र वाजिब-ए-सज्दा तो नहीं है
    इस दर्द-ए-मुजस्सम को भी तो घूर रहा है
    शो'ला कहीं दोज़ख़ का इरादा तो नहीं है
    मंज़िल का निशाँ खो गए गुम-कर्दा-रही से
    ये रास्ता फ़िरदौस का जादा तो नहीं है
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    ज़ीस्त बे-वादा-ए-अनवार-ए-सहर है कि जो थी
    ज़ुल्मत-ए-बख़्त ब-हर-रंग-ओ-नज़र है कि जो थी
    इश्क़ बर्बाद-कुन-ए-राहत-ए-दिल है कि जो था
    शोख़ी-ए-दोस्त ब-अंदाज़-ए-दिगर है कि जो थी

    आज भी कोई नहीं पूछता अहल-ए-दिल को
    आज भी ज़िल्लत-ए-अर्बाब-ए-नज़र है कि जो थी

    ख़ुद-परस्ती का रिवाज आज भी है आम कि था
    रास्ती आज भी मोहताज-ए-असर है कि जो थी

    आज भी जज़्बा-ए-इख़्लास परेशाँ है कि था
    आज भी दीदा-वरी ख़ाक-बसर है कि जो थी

    आज भी इल्म-ओ-हुनर की नहीं कोई वक़अत
    अब भी ना-क़द्री-ए-असहाब-ए-हुनर है कि जो थी

    आज भी मेहर-ओ-वफ़ा की नहीं क़ीमत कोई
    आज भी मंज़िलत-ए-कीसा-ए-ज़र है कि जो थी

    कामरानी पे है नाज़ाँ हवस-ए-हेच मदार
    आशिक़ी आज भी बा-दीदा-ए-तर है कि जो थी

    रूह-ए-इख़्लास तो दर-बंद है बे-पुर्सिश-ए-हाल
    मिदहत-ए-हुस्न सर-ए-राहगुज़र है कि जो थी

    साफ़-गोई को समझते हैं यहाँ ऐब अब भी
    ज़ेहनियत आज भी आलूदा-ए-शर है कि जो थी

    अस्प-ए-ताज़ी को मुयस्सर नहीं चारा 'शो'ला'
    और तन-ज़ेबी-ओ-आराइश-ए-ख़र है कि जो थी
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    नहीं कहते किसी से हाल-ए-दिल ख़ामोश रहते हैं
    कि अपनी दास्ताँ में तेरे अफ़्साने भी आते हैं

    वो जिन पर फ़ख़्र है फ़र्ज़ानगी को नुक्ता-दानी को
    तिरी महफ़िल में ऐसे चंद दीवाने भी आते हैं

    अदब करता हूँ मस्जिद का वहाँ हर रोज़ जाता हूँ
    कि उस की राह में दो-चार मयख़ाने भी आते हैं

    हमारे मय-कदे में मय भी है ईमाँ की बातें भी
    यहीं तो एक साहब वा'ज़ फ़रमाने भी आते हैं

    न घबरा चाहने वालों से ये तो ऐन-ए-फ़ितरत है
    कि शम्अ'' नूर-अफ़शाँ हो तो परवाने भी आते हैं
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    देख जुर्म-ओ-सज़ा की बात न कर
    मय-कदे में ख़ुदा की बात न कर

    मैं तो बे-मेहरियों का आदी हूँ
    मुझ से मेहर-ओ-वफ़ा की बात न कर

    शौक़-ए-बे-मुद्दआ' का मारा हूँ
    शौक़-ए-बे-मुद्दआ' की बात न कर

    वो तो मुद्दत हुई कि टूट गया
    मेरे दस्त-ए-दुआ की बात न कर

    जो नहीं इख़्तियार में मेरे
    उस बुत बे-वफ़ा की बात न कर
    इश्क़ की इंतिहा को देख ज़रा इश्क़ की इब्तिदा की बात न कर

    क्या मिला फ़िक्र की रसाई से
    मेरी फ़िक्र-ए-रसा की बात न कर

    इस की तक़दीर में ख़राबी थी
    इस दिल-ए-मुब्तला की बात न कर

    जो भी होना था हो गया 'शो'ला'
    करम-ए-नाख़ुदा की बात न कर
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    इश्क़ में आबरू ख़राब हुई
    ज़िंदगी सर-ब-सर अज़ाब हुई

    मेरे महबूब तेरी ख़ामोशी
    मेरी हर बात का जवाब हुई

    थी न आसूदगी मुक़द्दर में
    मेहरबानी तो बे-हिसाब हुई
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    एक रहज़न को अमीर-ए-कारवाँ समझा था मैं
    अपनी बद-बख़्ती को मंज़िल का निशाँ समझा था मैं

    तेरी मा'सूमी के सदक़े मेरी महरूमी की ख़ैर
    ऐ कि तुझ को सूरत-ए-आराम-ए-जाँ समझा था मैं

    दुश्मन-ए-दिल दुश्मन-ए-दीं दुश्मन-ए-होश-ओ-हवा से
    हाए किस ना-मेहरबाँ को मेहरबाँ समझा था मैं

    दोस्त का दर आ गया तो ख़ुद-ब-ख़ुद झुकने लगी
    जिस जबीं को बे-नियाज़-ए-आस्ताँ समझा था मैं

    क़ाफ़िले का क़ाफ़िला ही राह में गुम कर दिया
    तुझ को तो ज़ालिम दलील-ए-रह-रवाँ समझा था मैं

    मेरे दिल में आ के बैठे और यहीं के हो गए
    आप को तो यूसुफ़-ए-बे-कारवाँ समझा था मैं

    इक दरोग़-ए-मस्लहत-आमेज़ था तेरा सुलूक
    ये हक़ीक़त थी मगर ये भी कहाँ समझा था मैं

    ज़िंदगी इनआ'म-ए-क़ुदरत ही सही लेकिन इसे
    क्या ग़लत समझा अगर यार-ए-गराँ समझा था मैं

    फेर था क़िस्मत का वो चक्कर था मेरे पाँव का
    जिस को 'शो'ला' गर्दिश-ए-हफ़्त-आसमाँ समझा था मैं
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    अपनी बेचारगी पे रो न सके
    तेरे क्या होते अपने हो न सके

    ज़िंदगी और वो भी माँगे की
    हम नदामत का दाग़ धो न सके

    ख़ुद-फ़रेबी की इंतिहा ये है
    दिल सी बेकार शय भी खो न सके

    ना-ख़ुदा के बग़ैर कुछ न बना
    अपनी कश्ती भी ख़ुद डुबो न सके
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    ज़रा निगाह उठाओ कि ग़म की रात कटे
    नज़र नज़र से मिलाओ कि ग़म की रात कटे

    अब आ गए हो तो मेरे क़रीब आ बैठो
    दुई के नक़्श मिटाओ कि ग़म की रात कटे

    शब-ए-फ़िराक़ है शम-ए-उमीद ले आओ
    कोई चराग़ जलाओ कि ग़म की रात कटे

    कहाँ हैं साक़ी-ओ-मुत्रिब कहाँ है पीर-ए-हरम
    कहाँ हैं सब ये बुलाओ कि ग़म की रात कटे

    कहाँ हो मय-कदे वालो ज़रा इधर आओ
    हमें भी आज पिलाओ कि ग़म की रात कटे

    नहीं कुछ और जो मुमकिन तो यार 'शोला' की
    कोई ग़ज़ल ही सुनाओ कि ग़म की रात कटे
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    अपनों के सितम याद न ग़ैरों की जफ़ा याद
    वो हँस के ज़रा बोले तो कुछ भी न रहा याद

    क्या लुत्फ़ उठाएगा जहान-ए-गुज़राँ का
    वो शख़्स कि जिस शख़्स को रहती हो क़ज़ा याद

    हम काग उड़ा देते हैं बोतल का उसी वक़्त
    गर्मी में भी आ जाती है जब काली घटा याद

    महशर में भी हम तेरी शिकायत न करेंगे
    आ जाएगी उस दिन भी हमें शर्त-ए-वफ़ा याद

    पी ली तो ख़ुदा एक तमाशा नज़र आया
    आया भी तो आया हमें किस वक़्त ख़ुदा याद

    अल्लाह तिरा शुक्र कि उम्मीद-ए-करम है
    अल्लाह तिरा शुक्र कि उस ने भी किया याद

    कल तक तिरे बाइ'से मैं उसे भूला हुआ था
    क्यूँँ आने लगा फिर से मुझे आज ख़ुदा याद
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