Faizul Amin Faiz

Faizul Amin Faiz

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Faizul Amin Faiz shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Faizul Amin Faiz's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
हम किसी बात पर नहीं रोते
अपनी औक़ात पर नहीं रोते

तुम अगर होते कर्बला वाले
जंग में मात पर नहीं रोते

सुब्ह को शाम की नहीं पर्वा
दिन भी अब रात पर नहीं रोते

ज़िंदगी उन पे नाज़ करती है
जो भी हालात पर नहीं रोते

हिज्र का जश्न हम मनाएँ क्या
सर्द जज़्बात पर नहीं रोते

उन का दिल दिल नहीं है पत्थर है
जो फ़सादात पर नहीं रोते
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Faizul Amin Faiz
ज़हर पर ज़हर चल नहीं सकता
साँप बिच्छू निगल नहीं सकता

तजरबा लाख कीजिए इस पर
फिर भी पत्थर पिघल नहीं सकता

भूल बैठूँगा तुझ को जीते जी
मैं तो इतना बदल नहीं सकता

ग़ैर की टाँग खींच कर भाई
कोई आगे निकल नहीं सकता

उस की मर्ज़ी अगर नहीं होगी
गिरने वाला सँभल नहीं सकता

नोच सकता है वो हमारा पर
अज़्म लेकिन कुचल नहीं सकता
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Faizul Amin Faiz
शाम-ओ-सहर यूँ चुपके चुपके रोना क्या
किसी की ख़ातिर इतना पागल होना क्या

होश गँवा देते हैं तुम से मिल कर लोग
कर देते हो तुम भी जादू-टोना क्या

प्यार वो शय है जिस का कोई मोल नहीं
उस के आगे चाँदी क्या है सोना क्या

जब जी चाहा तुम ने उस को तोड़ दिया
जब ही बोलो दिल था मेरा खिलौना क्या

'फ़ैज़' यतीम-ओ-बेकस से ये पूछोगे
माँ के आँचल का होता है कोना क्या
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Faizul Amin Faiz
कड़ी थी धूप सर चकरा रहा था
मैं भूका था बहुत घबरा रहा था

तुम्हारा शहर क्या था क्या बताऊँ
तमाशा हर कोई दिखला रहा था

थे उस के हाथ में कश्कोल लेकिन
वो मेहर-ओ-माह को शरमा रहा था

अना का साँप मैं ने मार डाला
बहुत नुक़सान ये पहुँचा रहा था

अमीर-ए-शहर से ये कौन पूछे
सितम क्यों मुफ़लिसों पर ढा रहा था

लगे ठोकर तो ख़ुद ही तुम सँभल जाओ
सफ़र का तजरबा बतला रहा था

अकेली थी कोई लड़की सड़क पर
बदन जिस का मुझे ललचा रहा था

ये कैसा ख़्वाब मैं ने 'फ़ैज़' देखा
समुंदर मेरी जानिब आ रहा था
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Faizul Amin Faiz
हँसा था दो-घड़ी बरसों मगर आँसू बहाया था
मैं जब छोटा था इक लड़की से मैं ने दिल लगाया था

मिरे पैरों के नीचे की ज़मीं बंजर थी कुछ इतनी
सबा ने एक गुल कितने ज़माने में खिलाया था

सुलगती धूप में सोचो सफ़र कैसे कटा होगा
मिरी मंज़िल थी क्या और तुम ने क्या रस्ता दिखाया था

मोहब्बत आग है ऐसी जो पानी से नहीं बुझती
ज़माने ने अबस शो'ले को मुट्ठी में दबाया था

मैं ख़ुद महसूस करता हूँ कि अब आज़ाद हूँ मैं भी
कि पिंजरा खोल कर मैं ने परिंदों को उड़ाया था

मिरे हाथों पे सूखे फूल की कुछ पत्तियाँ रख कर
बिछड़ते वक़्त उस ने मुझ को सीने से लगाया था
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Faizul Amin Faiz
क़ुदरत का सरसब्ज़ बिछौना अच्छा लगता है
खुली फ़ज़ा में घास पे सोना अच्छा लगता है

शाम ढले जब शाख़ पे चिड़ियाँ नग़्मे गाती हैं
मुझ को तेरे साथ में होना अच्छा लगता है

हर एक चीज़ जो अपनी जगह पर सजी सजाई हो
ख़ुद ही घर का कोना कोना अच्छा लगता है

तुम क्या जानो रह रह कैसे पाते हैं मंज़िल
तुम को तो बस ख़्वाब सलोना अच्छा लगता है

मेरे गाँव के लोग भी कितने भोले-भाले हैं
आज भी उन को जादू-टोना अच्छा लगता है
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Faizul Amin Faiz
किसी आसेब का साया है इस पर लोग कहते हैं
पड़ा रहता है वो हुजरे के अंदर लोग कहते हैं

मिरी बस्ती में इक बुढ़िया है जो सच-मुच की डाइन है
वो खा जाती है बच्चों को पकड़ कर लोग कहते हैं

हर इक रिश्ता यहाँ क़ाएम है बस मतलब परस्ती पर
ज़माने में यही राइज है कल्चर लोग कहते हैं

मुअज़्ज़िज़ शख़्सियत है शहर का अब नामवर ग़ुंडा
कि बन बैठा है वो पार्टी का लीडर लोग कहते हैं

सबक़ लेता है जो भी ख़ामियों से अपने माज़ी की
वही जाता है मुस्तक़बिल में ऊपर लोग कहते हैं

तअ'ल्लुक़ है मिरा बस दोस्ती की हद तलक उस से
ग़लत बातें ही लेकिन क्यों बराबर लोग कहते हैं

शिकस्ता नाव ले कर 'फ़ैज़' निकले हो समुंदर में
तुम्हारा डूब जाना है मुक़द्दर लोग कहते हैं
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Faizul Amin Faiz
बदल रहा है ज़माना तो मेरे ठेंगे से
है मेरा तौर पुराना तो मेरे ठेंगे से

जो चार पैसे हैं मुट्ठी में बस वो मेरे हैं
है तेरे पास ख़ज़ाना तो मेरे ठेंगे से

कभी लकीर का बनता नहीं फ़क़ीर वो शख़्स
उसे न मानो सियाना तो मेरे ठेंगे से

मिरी कहानी हक़ीक़त पे मुनहसिर है मगर
तुझे लगे है फ़साना तो मेरे ठेंगे से

तिरी पसंद से मिलती नहीं पसंद मिरी
यही है एक बहाना तो मेरे ठेंगे से

अदू से करना है सारा हिसाब चुकता 'फ़ैज़'
अगर वो जाएगा थाना तो मेरे ठेंगे से
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Faizul Amin Faiz
माली को साज़िशों पे यूँ उकसा दिया गया
कलियाँ बनें न फूल ये समझा दिया गया

सच बोलने की जिस ने जसारत की दोस्तो
फाँसी पे एक दिन उसे लटका दिया गया

मंज़िल मिरे नसीब में लिख दी गई मगर
पुर-पेच रास्ता मुझे दिखला दिया गया

ख़ुद को समझ रहे हैं वही लोग होशियार
जिन को ख़िरद की राह से भटका दिया गया

फिर मय-कदे में टूट गई तौबा शैख़ की
जब मुफ़्त में शराब का प्याला दिया गया

बापू ने जो दिया था सबक़ याद है हमें
फिर ज़हर क्यों समाज में फैला दिया गया

महँगाई 'फ़ैज़' छूने लगी है अब आसमान
दिल्ली के तख़्त पर किसे बैठा दिया गया
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Faizul Amin Faiz
बाक़ी है उम्मीद ज़रा सी
ऐ पर्दा-वर दीद ज़रा सी

जिन में ज़ेहानत थी वो करते
क्यों अंधी तक़लीद ज़रा सी

मैं बीमार-दिल बच जाता
कर देते ताकीद ज़रा सी

और भी ताज़ा-दम करती है
फ़न को मिरे तन्क़ीद ज़रा सी

दुनिया भर के कुफ़्र पे तन्हा
हावी है तौहीद ज़रा सी

दिल की सुनूँगा लेकिन पहले
अक़्ल करे ताईद ज़रा सी

'फ़ैज़' जो तीसों रोज़ा रक्खे
क्यों वो मनाएँ ईद ज़रा सी
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Faizul Amin Faiz
तोलता क्या मुझ को कोई जौहरी मीज़ान में
मैं था मेरा और पड़ा था कोएले की कान में

तुम से तो होता नहीं है ए'तिराफ़-ए-फ़न मिरा
चंद जुमले मैं ही कहता हूँ तुम्हारी शान मैं

बरसर-ए-पैकार उस को देख कर सब शाद थे
जा लगा साहिल से वो तिनका मगर तूफ़ान में

सज रही हैं फिर सियासी मंडियाँ चारों तरफ़
देखना तब्दील होगा शहर क़ब्रिस्तान में

इश्क़ में सहरा-नवर्दी रास क्या आती मुझे
वो था कोई और जो फिरता था रेगिस्तान में

'फ़ैज़' ये मुझ को यक़ीं है साज़िशों के बावजूद
फूलती फलती रहेगी उर्दू हिन्दोस्तान में
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Faizul Amin Faiz
किसी से भी नहीं हम सब्र की तल्क़ीन लेते हैं
हमें मिलती नहीं जो चीज़ उस को छीन लेते हैं

बुढ़ापा आ गया लेकिन नहीं बदला मिज़ाज उन का
अभी तक कपड़े वो अपने लिए रंगीन लेते हैं

फ़क़ीरों को कभी दर से न ख़ाली लौटने देना
दुआएँ देते हैं ख़ैरात जब मिस्कीन लेते हैं

वो सारे लोग रंज-ओ-ग़म से पा जाते हैं आज़ादी
जो सुब्ह-ओ-शाम विर्द-ए-सूरा-ए-यासीन लेते हैं

तुम्हें हैरत है क्यों अहल-ए-फ़िलिस्तीं की शुजाअ'त पर
यज़ीदों से सदा लोहा तो अहल-ए-दीन लेते हैं
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Faizul Amin Faiz