तेरी ज़ुल्फ़ों की असीरी से रिहा हो जाना
इस सेे बेहतर है मोहब्बत में फ़ना हो जाना
गर ख़ता ही न करूँँ लोग मलक समझेंगे
आदमियत है मरी मुझ सेे ख़ता हो जाना
याद है ज़ख़्म-ए-दिल-ए-चाक को राहत देना
और फिर बाद-ए-सबा का भी हवा हो जाना
देख कर मुझ पे मेरे रब का करम दुश्मन की
बद-दुआओं को भी आता है दु'आ हो जाना
उनका अंदाज़ कि वो पहले मनाना मुझ को
और फिर ख़ुद भी उसी दम में ख़फ़ा हो जाना
एक इंसाँ है कि इंसान भी बनना मुश्किल
और बुतों के लिए आसाँ है ख़ुदा हो जाना
तेरे जाने का तसव्वुर है तसव्वुर ऐसा
जैसे इक रूह का क़ालिब से जुदा हो जाना
उस की क़िस्मत में ज़माने की शहंशाही है
जिस को आता है तेरे दर का गदा हो जाना
इश्क़ करने से मुझे रोक न वाइज़ 'सालिम'
ज़ेब देता नहीं वाजिब का क़ज़ा हो जाना
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