Iqbal Azeem

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@iqbal-azeem

Iqbal Azeem shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Iqbal Azeem's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

हमें अपने घर से चले हुए सर-ए-राह उम्र गुज़र गई कोई जुस्तुजू का सिला मिला न सफ़र का हक़ ही अदा हुआ — Iqbal Azeem
अपनी मिट्टी ही पे चलने का सलीक़ा सीखो संग-ए-मरमर पे चलोगे तो फिसल जाओगे — Iqbal Azeem
आदमी जान के खाता है मोहब्बत में फ़रेब ख़ुद-फ़रेबी ही मोहब्बत का सिला हो जैसे — Iqbal Azeem
हम बहुत दूर निकल आए हैं चलते चलते अब ठहर जाएँ कहीं शाम के ढलते ढलते — Iqbal Azeem
अब हम भी सोचते हैं कि बाज़ार गर्म है अपना ज़मीर बेच के दुनिया ख़रीद लें — Iqbal Azeem
क़ातिल ने किस सफ़ाई से धोई है आस्तीं उस को ख़बर नहीं कि लहू बोलता भी है — Iqbal Azeem

Ghazal

अपने मरकज़ से अगर दूर निकल जाओगे ख़्वाब हो जाओगे अफ़्सानों में ढल जाओगे अब तो चेहरों के ख़द-ओ-ख़ाल भी पहले से नहीं किस को मालूम था तुम इतने बदल जाओगे अपने परचम का कहीं रंग भुला मत देना सुर्ख़ शो'लों से जो खेलोगे तो जल जाओगे दे रहे हैं तुम्हें तो लोग रिफ़ाक़त का फ़रेब उन की तारीख़ पढ़ोगे तो दहल जाओगे अपनी मिट्टी ही पे चलने का सलीक़ा सीखो संग-ए-मरमर पे चलोगे तो फिसल जाओगे ख़्वाब-गाहों से निकलते हुए डरते क्यूँँ हो धूप इतनी तो नहीं है कि पिघल जाओगे तेज़ क़दमों से चलो और तसादुम से बचो भीड़ में सुस्त चलोगे तो कुचल जाओगे हम-सफ़र ढूँडो न रहबर का सहारा चाहो ठोकरें खाओगे तो ख़ुद ही सँभल जाओगे तुम हो इक ज़िंदा-ए-जावेद रिवायत के चराग़ तुम कोई शाम का सूरज हो कि ढल जाओगे सुब्ह-ए-सादिक़ मुझे मतलूब है किस से माँगूँ तुम तो भोले हो चराग़ों से बहल जाओगे — Iqbal Azeem
मुझे अपने ज़ब्त पे नाज़ था सर-ए-बज़्म रात ये क्या हुआ मिरी आँख कैसे छलक गई मुझे रंज है ये बुरा हुआ मिरी ज़िंदगी के चराग़ का ये मिज़ाज कोई नया नहीं अभी रौशनी अभी तीरगी न जला हुआ न बुझा हुआ मुझे जो भी दुश्मन-ए-जाँ मिला वही पुख़्ता-कार-ए-जफ़ा मिला न किसी की ज़र्ब ग़लत पड़ी न किसी का तीर ख़ता हुआ मुझे आप क्यूँँ न समझ सके ये ख़ुद अपने दिल ही से पूछिए मिरी दास्तान-ए-हयात का तो वरक़ वरक़ है खुला हुआ जो नज़र बचा के गुज़र गए मिरे सामने से अभी अभी ये मिरे ही शहर के लोग थे मिरे घर से घर है मिला हुआ हमें इस का कोई भी हक़ नहीं कि शरीक-ए-बज़्म-ए-ख़ुलूस हों न हमारे पास नक़ाब है न कुछ आस्तीं में छुपा हुआ मुझे इक गली में पड़ा हुआ किसी बद-नसीब का ख़त मिला कहीं ख़ून-ए-दिल से लिखा हुआ कहीं आँसुओं से मिटा हुआ मुझे हम-सफ़र भी मिला कोई तो शिकस्ता-हाल मिरी तरह कई मंज़िलों का थका हुआ कहीं रास्तों में लुटा हुआ हमें अपने घर से चले हुए सर-ए-राह उम्र गुज़र गई कोई जुस्तुजू का सिला मिला न सफ़र का हक़ ही अदा हुआ — Iqbal Azeem