Kumar Rishi

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@kumar-rishi

Kumar Rishi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Kumar Rishi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
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Sher

तू यहाँ से गुज़रेगी कभी कब से मेरी आँखें हैं बिछी — Kumar Rishi
बोलो क्या लिखूँ मैं ऐसा कि कमाल हो जाए सो चुके जवाबों से कोई सवाल हो जाए — Kumar Rishi
जितने दिन उस के बिन गुजरते हैं उतने दिन हम जीते नहीं मरते हैं — Kumar Rishi
ख़ूब-सूरत चेहरे यूँँ हीं हिजाब में नहीं होते बेवजह काँटे यूँँ हीं गुलाब में नहीं होते — Kumar Rishi
बड़ा बे-दर्द होता है आसमान ज़मीं से छीन लेता है इंसान — Kumar Rishi
उस की यादों में मैं पागल हुए जा रहा हूँ ना जाने कैसे ये ज़िन्दगी जिए जा रहा हूँ — Kumar Rishi
उस के बिना ज़िन्दगी का गुज़ारा ना होगा हम को पता है कि वो अब हमारा ना होगा — Kumar Rishi
जैसे ही मुझे उसे मनाना आ गया मेरे और उस के बीच ज़माना आ गया — Kumar Rishi
ज़िन्दगी में हर किसी को हर ख़ुशी नहीं मिलती मौत माँगने पर भी इस जहाँ में मौत नहीं मिलती — Kumar Rishi
कभी वो पास तो कभी इतनी दूर लगती है कभी इस जहाँ की तो कभी अंबर की हूर लगती है — Kumar Rishi
दिलों के ज़ख़्मों को यूँँ हीं मिटाया नहीं जा सकता कि तेरा हो गया मैं अब मिटाया नहीं जा सकता — Kumar Rishi

Nazm

एक ही सिगरेट से कश लगाते रहे हम दोनों कभी ग़म के तो कभी ख़ुशी के तराने गुनगुनाते रहे हम दोनों तुम्हारे सुर्ख़ गुलाबी लबों पर सिगरेट ऐसे सजती है दिल में मानो हमारे जैसे बाँसुरी बजती है सिगरेट ना हो जैसे कोई गुलाब हो जो तुम ने चूमा है गर्मी के मौसम में भी आज बादल झूमा है तुम्हारे लबों से निकलता जो धुआँ है हमारे लबों को इसने बे-हिसाब छुआ है तुम्हारी साँसों की ख़ुशबू इस के साथ आई है ना जाने ये कैसी मदहोशी हम पर छाई है बस यूँँ हीं हमारी गोद में बैठी रहो तुम अब कभी हम कश लगाएं कभी तुम कश ये सिगरेट यूँँ हीं सुलगती रहे दिलों में आग यूँँ हीं जलती रहे तुम्हारे इन नर्म गुलाबी होंठो को छू कर सिगरेट बड़ा इतराती है हमारी ओर देख कर हम को बड़ा चिढ़ाती है मग़र सिगरेट की ज़िंदा-दिली देखिए तुम्हारे होंठों से निकलकर हमारे होंठो पे भी आ जाती है!! — Kumar Rishi
एक ही सिगरेट से कश लगाते रहे हम दोनों कभी ग़म के तो कभी ख़ुशी के तराने गुनगुनाते रहे हम दोनों तुम्हारे सुर्ख़ गुलाबी लबों पर सिगरेट ऐसे सजती है दिल में मानो हमारे जैसे बाँसुरी बजती है सिगरेट ना हो जैसे कोई गुलाब हो जो तुम ने चूमा है गर्मी के मौसम में भी आज बादल झूमा है तुम्हारे लबों से निकलता जो धुआँ है हमारे लबों को इसने बे-हिसाब छुआ है तुम्हारी साँसों की ख़ुशबू इस के साथ आई है ना जाने ये कैसी मदहोशी हम पर छाई है बस यूँँ हीं हमारी गोद में बैठी रहो तुम अब कभी हम कश लगाएं कभी तुम कश ये सिगरेट यूँँ हीं सुलगती रहे दिलों में आग यूँँ हीं जलती रहे तुम्हारे इन नर्म गुलाबी होंठो को छू कर सिगरेट बड़ा इतराती है हमारी ओर देख कर हम को बड़ा चिढ़ाती है मग़र सिगरेट की ज़िंदा-दिली देखिए तुम्हारे होंठों से निकलकर हमारे होंठो पे भी आ जाती है!! — Kumar Rishi