एक ही सिगरेट से कश लगाते रहे हम दोनों
कभी ग़म के तो कभी ख़ुशी के तराने गुनगुनाते रहे हम दोनों
तुम्हारे सुर्ख़ गुलाबी लबों पर सिगरेट ऐसे सजती है
दिल में मानो हमारे जैसे बाँसुरी बजती है
सिगरेट ना हो जैसे कोई गुलाब हो जो तुम ने चूमा है
गर्मी के मौसम में भी आज बादल झूमा है
तुम्हारे लबों से निकलता जो धुआँ है
हमारे लबों को इसने बे-हिसाब छुआ है
तुम्हारी साँसों की ख़ुशबू इस के साथ आई है
ना जाने ये कैसी मदहोशी हम पर छाई है
बस यूँ हीं हमारी गोद में बैठी रहो तुम अब
कभी हम कश लगाएं कभी तुम कश
ये सिगरेट यूँ हीं सुलगती रहे
दिलों में आग यूँ हीं जलती रहे
तुम्हारे इन नर्म गुलाबी होंठो को छू कर
सिगरेट बड़ा इतराती है
हमारी ओर देख कर
हम को बड़ा चिढ़ाती है
मग़र सिगरेट की ज़िंदा-दिली देखिए
तुम्हारे होंठों से निकलकर
हमारे होंठो पे भी आ जाती है!!















