उस की उल्फ़त में छुपा पहलू-ए-बातिल निकला
मैं समझता था मसीहा जिसे, क़ातिल निकला
बात जब आई वफ़ादारी ओ ख़ुद्दारी की
अन्जुमन में कोई अपना न मुक़ाबिल निकला
सिलसिला जिस का जुड़ा रहता था तूफ़ानों से
डूबने वालों के हक़ में वही साहिल निकला
जिन को दावा-ए-ख़िरदमंदी था नादां निकले
जिस को दीवाना समझते थे वो आक़िल निकला
उसने चाहत भरी नज़रों से मुझे जब देखा
मुझ को ऐसा लगा पहलू से मिरा दिल निकला
उन को समझाना उन्हें पाना उन्हें अपनाना
कितना आसान नज़र आता था, मुश्किल निकला
जिस के चहरे पे लकीरें थी वफ़ादारी की
हाए वो चहरा भी ग़द्दारों में शामिल निकला
उम्र भर उसके तजस्सुस में रहा मैं अनवर
इस तगोदौ का मगर कुछ भी न हासिल निकला
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