Raza sahil

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@razash453276

Raza sahil shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Raza sahil's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

परिंदे थे रज़ा उँची उड़ानों के मगर सय्याद ने पर काट डाले हैं — Raza sahil
अब नहीं सुन ने वाला अपनी भी दिल उतर आया है बग़ावत पर — Raza sahil
नाम हरे-हरे कृष्ण का हर दम जपती जाऊँ और न कोई चाहत ऐ गिरधर मीरा की — Raza sahil
इश्क़ बस ये बात को सोच कर नहीं किया घर की तर्बियत पे मेरे न उँगलियाँ उठे — Raza sahil
तेरी तस्वीर चश्में तर में कैसे बनती है? समझना है? दीया ला और पानी में रख दे — Raza sahil
मनाए जाते हैं साल-हा-साल जन्मदिन हम चुकाए जाते हैं जैसे किश्तें ये ज़िंदगी की — Raza sahil
वो जो दीवार के उस पार है, वो दुश्मन है हम को दीवार के इस पार से बचना होगा — Raza sahil
हम अपनी मुफ़लिसी पर ख़ूब रोए है "रज़ा" कहा जब बच्चे ने मुझ को खिलौना चाहिए — Raza sahil
फिर हुए आज मजबूर मस्खे गुलू के लिए हम फिर किसी चहरे ने आज रस्सी गले से निकाली — Raza sahil
रहनुमाई की दस्तार हम को दी जाए आप से अब सदारत नहीं होने वाली — Raza sahil
ज़मीं पर आगया सूरज या के दिल है ये क्या जलता है ये कैसे उजाले हैं — Raza sahil
तुम जिसे कह रहे हो पत्थर आज वो कभी दोस्त धड़कता भी था — Raza sahil
दफ़्न कर के गाँव में ख़्वाहिशों‌ को आए थे शहर में ज़रूरतें घर की हम कमाने को — Raza sahil
मुझे तुम सिर्फ़ अफ़्साना ना समझो सुनो मैं एक सच्ची दास्ताँ हूँ — Raza sahil
एक क़यामत से कम नहीं है ये तेरा हो के भी ग़ैर का होना — Raza sahil
निकल के दिल से आँखों के जो शहर में हुए थे यकजा अब उन दुखों को आसुँओं की शक्ल में बहा रहा हूँ — Raza sahil
करो तहकी़क़ इस मिट्टी की पहले इसी में दफ़्न है शजरा हमारा — Raza sahil
बिखरी पड़ी है यादें तेरी दिल के कमरे में आँखों के शहर में उन्हें यकजा नहीं किया — Raza sahil
बालों पर नोच के हम अपनी उडानों से गए गर्दिशे बख़्त के मारे हुए शाहीन हैं हम — Raza sahil

Ghazal

दास्ताँ तेरी सुनाते हैं चले जाते हैं बे-वफ़ा तुझ को बताते हैं चलें जाते है ले के गज़लों का सहारा तेरी महफ़िल में हम अपने हालात सुनाते हैं चलें जाते है चंद लम्हात हमें वस्ल के मिलते हैं फिर वो घड़ी अपनी दिखाते हैं चलें जाते हैं पूछता ही नहीं कोई भी मेरा दुख मुझ सेे दुख सभी अपना सुनाते है चले जाते है देखने आते हैं बीमार को तेरे जो भी अश्क दो चार बहाते है चले जाते हैं इक कहानी है फ़क़त दुनिया कि जिस में हम सब अपना किरदार निभाते हैं चलें जाते है हम है आवारा भटकते हुए बादल साहिल दश्त की प्यास बुझाते है चलें जाते है — Raza sahil
फिर ज़बान से सब की मरहबा निकलता है बन सँवर के जब घर से बे-वफ़ा निकलता है बैठ कर वही हम आवारा गर्दी करते है गाँव से जो बाहर एक रास्ता निकलता है ज़िंदगी शुक्रिया तेरी अताए है के जो उम्र से बड़ा मेरा तजरबा निकलता है तुम ने ख़ैर मोती ही जाना है मगर तुम को क्या पता के दरया से और क्या निकलता है ला-मकानी का जब दावा है तेरा तो फिर क्यूँ ढूँढ़ने तेरा हर कोई पता निकलता है देखा है हटा कर वहदत का पर्दा भी हम ने कुछ नहीं निकलता बस आइना निकलता है हक़ परस्तों की जब इम्दाद करता है मौला दरिया से भी साहिल फिर रास्ता निकलता है — Raza sahil