फिर ज़बान से सब की मरहबा निकलता है

बन सँवर के जब घर से बे-वफ़ा निकलता है

बैठ कर वही हम आवारा गर्दी करते है
गाँव से जो बाहर एक रास्ता निकलता है

ज़िंदगी शुक्रिया तेरी अताए है के जो
उम्र से बड़ा मेरा तजरबा निकलता है

तुम ने ख़ैर मोती ही जाना है मगर तुम को
क्या पता के दरया से और क्या निकलता है

ला-मकानी का जब दावा है तेरा तो फिर क्यूँ
ढूँढ़ने तेरा हर कोई पता निकलता है

देखा है हटा कर वहदत का पर्दा भी हम ने
कुछ नहीं निकलता बस आइना निकलता है

हक़ परस्तों की जब इम्दाद करता है मौला
दरिया से भी साहिल फिर रास्ता निकलता है

— Raza sahil

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