मेरे भी पाओ रुक रहे थे गांव से जाते हुए
जब उस की आँख में आँसू थे हाथ हिलाते हुए
तू मेरे ख़द-ओ-ख़ाल बना भी ले मुसव्वीर मगर
इक उम्र ही लगेगी मेरी शोख़ी बनाते हुए
इल्ज़ाम आखिरस उसी इंसाँ पे लगाया गया
वो जिस के हाथ जल गए थे आग बुझाते हुए
ख़्वाहिश को रौन्दना पड़ता है ख़ुद पैरों तले
घर की हर इक जरुरतो का भार उठाते हुए
मेरे नजूमी राज़ कहीं खोल न दे इस लिए
अक्सर झिझकता हूँ अपना हाथ दिखाते हुए
— Raza sahil















