पहले तो मुझे वो मुश्किल में डाल देता है

फिर जहाँ को सारे मेरी मिसाल देता है

वो करीम है और इतना करीम, जब भी मैं
क़तरा मागता हूँ दरिया उछाल देता है

कट रही है ग़ुर्बत में ज़िंदगी तो क्या यारों
शुक्र है कि अल्लाह रिज़्क़-ए-हलाल देता है

रहगुज़र से हट कर जो चलती है बुज़ुर्गों की
ऐसी क़ौम पर फिर मौला ज़वाल देता है

अपनी ज़िद पे आजाए रब का बंदा तो ज़ाहिद
एक इशारे पर सूरज को निकाल देता है

ख़ुद मसर्रतों के हाले बनाता है साहिल
पहले जो मेरी क़िस्मत में मलाल देता है

— Raza sahil

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Muflisi Shayari

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