ले लिया है बहुत जायज़ा ज़िंदगी का
फिर भी समझे न हम फ़लसफ़ा ज़िंदगी का
जितना वक़्फा रखा है नमाज़ों अज़ाँ में
है फ़क़त उतना ही दायरा ज़िंदगी का
है अभी वक़्त करले गुनाहो से तौबा
जाने फूटेगा कब बुलबुला ज़िंदगी का
मौला इक उम्र में इतना तो समझे है हम
मौत से कड़वा है ज़ाइका ज़िंदगी का
किस लिए भेजा था तू ने दुनिया में या रब
करना क्या था हमें क्या किया ज़िंदगी का
जितनी भी थी किसी शख़्स पे वार आए
और करते भी क्या हम 'रज़ा' ज़िंदगी का
— Raza sahil















