दवा से ठीक हो जाऊँगा लेकिन होना ही क्यूँ है
दुआ से ठीक हो जाऊँगा लेकिन होना ही क्यूँ है
दुआ से ठीक हो जाऊँगा लेकिन होना ही क्यूँ है
मुझे मालूम है कुछ लोग साज़िश रचते होंगे पर
जफ़ा से ठीक हो जाऊँगा लेकिन होना ही क्यूँ है
मरीज़-ए-इश्क़ हूँ मैं मुद्दतों से एक उस की सिर्फ़
अदास ठीक हो जाऊँगा लेकिन होना ही क्यूँ है
ज़ियादा वक़्त क्यूँ बर्बाद करते हो यहाँ मुझ पर
हवा से ठीक हो जाऊँगा लेकिन होना ही क्यूँ है
तुम्हारी ये मुहब्बत देखके मुझ को तो लगता है
वफ़ा से ठीक हो जाऊँगा लेकिन होना ही क्यूँ है
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हर एक शख़्स मुहब्बत में ढल रहा है आज
मिरा ही दिल है जो बेबाक चल रहा है आज
मिरा ही दिल है जो बेबाक चल रहा है आज
किसी किसी को ख़बर है मैं कैसा इंसाँ हूँ
जो बे-ख़बर था वो अब हाथ मल रहा है आज
न कोई रिश्ता न है कोई आश्ना उस से
ज़माना जानता है फिर भी जल रहा है आज
जो देखते हो ये मौसम सुहाना और हसीं
ये सिर्फ़ हँसने से उस के बदल रहा है आज
डरा डरा सा कभी रहता था जो शख़्स यहाँ
किसी के प्यार के आँचल में पल रहा है आज
दुआ कु़बूल भी की जा रही है मेरी अब
सो धीरे धीरे वो दिल से निकल रहा है आज
नसीब ने मिरे करवट कुछ इस तरह बदली
कि एक पल का सुकूँ तक फिसल रहा है आज
ये कश्मकश ही न होती जो मौत आ जाती
वो शख़्स झूठ पे झूठ अब उगल रहा है आज
उसे बस एक दफ़ा देखना था देख लिया
तुम अब न पूछो कि कितना सफल रहा है आज
ये सरकशी है या आवारगी है मेरी 'अनुज'
मिरा ही जिस्म मुझे ही निगल रहा है आज
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मैं नीम को ही चाशनी कहता रहा
फिर दोस्ती को ज़िंदगी कहता रहा
फिर दोस्ती को ज़िंदगी कहता रहा
हर बात से था बे-ख़बर मासूम दिल
क्यूँ ज़िंदगी को ख़ुद-कुशी कहता रहा
संसार से मुझ को मिली जो आजतक
हर बद-दुआ को बंदगी कहता रहा
साज़िश में दिल लगता था उस का और मैं
हर-पल ख़ुदा की सादगी कहता रहा
कोयल बड़ी चालाक निकली थी ‘अनुज’
हर राग को ही रागिनी कहता रहा
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मुझ से कहती कि ये इश्क़ क्या होता है
मैं उसे कहता हूँ इक नशा होता है
मैं उसे कहता हूँ इक नशा होता है
या तो हर शख़्स इस
में फ़ना होता है
या किसी के लिए बस जुआ होता है
दर्द जो अपने ही हमनवा से मिले
उस
में भी दर्द ये अच्छा सा होता है
जितनी ही बार होता रहे इश्क़ पर
हर जवाँ के लिए कुछ नया होता है
प्यास और भूख इस के लिए कुछ नहीं
ये ख़ुदा से न कम पर बड़ा होता है
कितनी साँसें थमी हैं 'अनुज' इश्क़ में
क्यूँ किसी से ये आख़िर जुदा होता है
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दर्द अपना सब गिरा के जाते हैं
दर पे तेरे लोग जितने आते हैं
दर पे तेरे लोग जितने आते हैं
हम बने बेज़ार बंजारे यहाँ
अब कभी धोके कभी ग़म पाते हैं
कितनी कंगाली है छाई इश्क़ की
कुछ वफ़ा वाले भी सिक्के लाते हैं
ज़िंदगी बे-रंग तख़्ती लगती है
इस लिए ग़म के तराने गाते हैं
गुम-शुदा हों जब लकीरें हाथ की
क्या वो फिर भी बंदों को अपनाते हैं
इश्क़ से क्या पेट क्या घर ही चले
मेरे अपने तो यही समझाते हैं
इन हवाओं को मिली जानिब 'अनुज'
बाल जब जब तेरे ये लहराते हैं
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तेरी ही इन आँखों का काजल हूँ बना
धरती बनी हो जब तो बादल हूँ बना
धरती बनी हो जब तो बादल हूँ बना
सब को दिखा सकती हो तुम आसानी से
देखो वही प्यारी सी पायल हूँ बना
मन कब से तालिब सा हुआ बैठा यहाँ
कोशिश बड़ी की तब ये आँचल हूँ बना
शायद कभी समझा न पाया ढंग से
दिल से तभी आधा ही पागल हूँ बना
रहबर ज़रा ख़ुद गुम यहाँ लगता ‘अनुज’
मजबूर हो के ही हलाहल हूँ बना
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जब जब हाथों को थामा था
तू लगता मुझ को प्यारा था
तू लगता मुझ को प्यारा था
बेबस होना अच्छा सा है
कोई अपना मिल जाता था
जो कुछ भी आया हाथों में
पूरा का पूरा पाया था
तेरे बिन जीने का थोड़ी
हम ने वो वा'दा पाला था
तुम को अपना ही ग़म दिखता
तुम ने कब से सँभाला था
जज़्बा मानो खो ही बैठा
जो माना तुम को माना था
साहस संयम सब कुछ मैं ने
तुझ को ही पहना डाला था
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