sahllucknowi

Top 10 of sahllucknowi

    दवा से ठीक हो जाऊँगा लेकिन होना ही क्यूँ है
    दुआ से ठीक हो जाऊँगा लेकिन होना ही क्यूँ है

    मुझे मालूम है कुछ लोग साज़िश रचते होंगे पर
    जफ़ा से ठीक हो जाऊँगा लेकिन होना ही क्यूँ है

    मरीज़-ए-इश्क़ हूँ मैं मुद्दतों से एक उस की सिर्फ़
    अदास ठीक हो जाऊँगा लेकिन होना ही क्यूँ है

    ज़ियादा वक़्त क्यूँ बर्बाद करते हो यहाँ मुझ पर
    हवा से ठीक हो जाऊँगा लेकिन होना ही क्यूँ है

    तुम्हारी ये मुहब्बत देखके मुझ को तो लगता है
    वफ़ा से ठीक हो जाऊँगा लेकिन होना ही क्यूँ है
    Read Full
    sahllucknowi
    10
    2 Likes
    हर एक शख़्स मुहब्बत में ढल रहा है आज
    मिरा ही दिल है जो बेबाक चल रहा है आज

    किसी किसी को ख़बर है मैं कैसा इंसाँ हूँ
    जो बे-ख़बर था वो अब हाथ मल रहा है आज

    न कोई रिश्ता न है कोई आश्ना उस से
    ज़माना जानता है फिर भी जल रहा है आज

    जो देखते हो ये मौसम सुहाना और हसीं
    ये सिर्फ़ हँसने से उस के बदल रहा है आज

    डरा डरा सा कभी रहता था जो शख़्स यहाँ
    किसी के प्यार के आँचल में पल रहा है आज

    दुआ कु़बूल भी की जा रही है मेरी अब
    सो धीरे धीरे वो दिल से निकल रहा है आज

    नसीब ने मिरे करवट कुछ इस तरह बदली
    कि एक पल का सुकूँ तक फिसल रहा है आज

    ये कश्मकश ही न होती जो मौत आ जाती
    वो शख़्स झूठ पे झूठ अब उगल रहा है आज

    उसे बस एक दफ़ा देखना था देख लिया
    तुम अब न पूछो कि कितना सफल रहा है आज

    ये सरकशी है या आवारगी है मेरी 'अनुज'
    मिरा ही जिस्म मुझे ही निगल रहा है आज
    Read Full
    sahllucknowi
    9
    2 Likes
    इस दिल को बेहद रोना आता है
    जब बिन देखे मुझ को मुड़ जाता है

    लाखों पत्ते गिर गिर के कहते हैं
    आख़िर कैसे ख़ुद को बहलाता है

    अपने वादे पर रहता है क़ाएम
    ये ख़ूबी मुझ को भी सिखलाता है

    हसरत वापस अपनी ले के जाते
    उस का इनकार सब को तड़पाता है

    कुछ बचकानी हरकतें बाक़ी उस
    में
    ख़ुद ग़लती कर के भी मुस्काता है
    Read Full
    sahllucknowi
    8
    2 Likes
    मैं नीम को ही चाशनी कहता रहा
    फिर दोस्ती को ज़िंदगी कहता रहा

    हर बात से था बे-ख़बर मासूम दिल
    क्यूँ ज़िंदगी को ख़ुद-कुशी कहता रहा

    संसार से मुझ को मिली जो आजतक
    हर बद-दुआ को बंदगी कहता रहा

    साज़िश में दिल लगता था उस का और मैं
    हर-पल ख़ुदा की सादगी कहता रहा

    कोयल बड़ी चालाक निकली थी ‘अनुज’
    हर राग को ही रागिनी कहता रहा
    Read Full
    sahllucknowi
    7
    2 Likes
    मुझ से कहती कि ये इश्क़ क्या होता है
    मैं उसे कहता हूँ इक नशा होता है

    या तो हर शख़्स इस
    में फ़ना होता है
    या किसी के लिए बस जुआ होता है

    दर्द जो अपने ही हमनवा से मिले
    उस
    में भी दर्द ये अच्छा सा होता है

    जितनी ही बार होता रहे इश्क़ पर
    हर जवाँ के लिए कुछ नया होता है

    प्यास और भूख इस के लिए कुछ नहीं
    ये ख़ुदा से न कम पर बड़ा होता है

    कितनी साँसें थमी हैं 'अनुज' इश्क़ में
    क्यूँ किसी से ये आख़िर जुदा होता है
    Read Full
    sahllucknowi
    6
    2 Likes
    सताके गली से गुज़रने लगा है
    ये मन पहले जैसे ही मरने लगा है

    मुझे नींद गहरी दिला कर गया ख़ुद
    किसी और के घर सॅंवरने लगा है

    बताया हुआ काम करता नहीं है
    वो बिन कुछ कहे काम करने लगा है

    कभी जो रहा बनके रहबर हमारा
    वही वक़्त देखो बिखरने लगा है

    किसी से शिकायत नहीं करता है दिल
    वो सोहबत से मेरी सुधरने लगा है
    Read Full
    sahllucknowi
    5
    2 Likes
    दर्द अपना सब गिरा के जाते हैं
    दर पे तेरे लोग जितने आते हैं

    हम बने बेज़ार बंजारे यहाँ
    अब कभी धोके कभी ग़म पाते हैं

    कितनी कंगाली है छाई इश्क़ की
    कुछ वफ़ा वाले भी सिक्के लाते हैं

    ज़िंदगी बे-रंग तख़्ती लगती है
    इस लिए ग़म के तराने गाते हैं

    गुम-शुदा हों जब लकीरें हाथ की
    क्या वो फिर भी बंदों को अपनाते हैं
    इश्क़ से क्या पेट क्या घर ही चले
    मेरे अपने तो यही समझाते हैं

    इन हवाओं को मिली जानिब 'अनुज'
    बाल जब जब तेरे ये लहराते हैं
    Read Full
    sahllucknowi
    4
    2 Likes
    तेरी ही इन आँखों का काजल हूँ बना
    धरती बनी हो जब तो बादल हूँ बना

    सब को दिखा सकती हो तुम आसानी से
    देखो वही प्यारी सी पायल हूँ बना

    मन कब से तालिब सा हुआ बैठा यहाँ
    कोशिश बड़ी की तब ये आँचल हूँ बना

    शायद कभी समझा न पाया ढंग से
    दिल से तभी आधा ही पागल हूँ बना

    रहबर ज़रा ख़ुद गुम यहाँ लगता ‘अनुज’
    मजबूर हो के ही हलाहल हूँ बना
    Read Full
    sahllucknowi
    3
    4 Likes
    जब जब हाथों को थामा था
    तू लगता मुझ को प्यारा था

    बेबस होना अच्छा सा है
    कोई अपना मिल जाता था

    जो कुछ भी आया हाथों में
    पूरा का पूरा पाया था

    तेरे बिन जीने का थोड़ी
    हम ने वो वा'दा पाला था

    तुम को अपना ही ग़म दिखता
    तुम ने कब से सँभाला था

    जज़्बा मानो खो ही बैठा
    जो माना तुम को माना था

    साहस संयम सब कुछ मैं ने
    तुझ को ही पहना डाला था
    Read Full
    sahllucknowi
    2
    3 Likes
    आज कुछ तो ठानी है
    बात उस ने मानी है

    थाम लेता मैं उस को
    ये उसे बतानी है

    दिल मेरा नहीं टूटा
    बात ये भुलानी है

    हौले से उसे छू के
    प्यास इक बुझानी है

    कोहसार लब चुप हैं
    ख़ामोशी सुनानी है
    Read Full
    sahllucknowi
    1
    3 Likes