ज़वाल-ए-आदमी है ये वबाल-ए-आदमी है ये
अगर कहूँ दुरुस्त है कि मर्ग-ए-आदमी है ये
ये गंदगी का ढेर है ग़िलाफ़ में ढका छुपा
ये ख़ौफ़नाक ज़हर है मिठास में मिला-जुला
वबा-ए-हौल-नाक है बला-ए-हौल-नाक है
ये चलती फिरती आग है दयार ओ मुल्क ओ शहर में
निफ़ाक़ से ख़ुदा बचाए रोग ये ख़बीस है
लिबास-ए-जिस्म-ए-आदमी में कोढ़ है छुपा हुआ
मुनाफ़िक़ों की ख़स्लतें अजीब हैं ग़रीब हैं
ज़बाँ पे कुछ है दिल में कुछ कहेंगे कुछ करेंगे कुछ
ज़बाँ पे दोस्ती का राग आस्तीन में छुरी
दिलों में बुग़्ज़ है भरा मगर लबों पे है हँसी
ज़बान पर ख़ुदा की रट दिलों में फ़िक्र-ए-शैतनत
ये अपने आप हैं ख़ुदा ग़रज़ को पूजते हैं ये
ये नफ़्स के ग़ुलाम हैं मफ़ाद के ग़ुलाम हैं
ये अपने आप मुक़तदी ये अपने ख़ुद इमाम हैं
Read Fullअगर कहूँ दुरुस्त है कि मर्ग-ए-आदमी है ये
ये गंदगी का ढेर है ग़िलाफ़ में ढका छुपा
ये ख़ौफ़नाक ज़हर है मिठास में मिला-जुला
वबा-ए-हौल-नाक है बला-ए-हौल-नाक है
ये चलती फिरती आग है दयार ओ मुल्क ओ शहर में
निफ़ाक़ से ख़ुदा बचाए रोग ये ख़बीस है
लिबास-ए-जिस्म-ए-आदमी में कोढ़ है छुपा हुआ
मुनाफ़िक़ों की ख़स्लतें अजीब हैं ग़रीब हैं
ज़बाँ पे कुछ है दिल में कुछ कहेंगे कुछ करेंगे कुछ
ज़बाँ पे दोस्ती का राग आस्तीन में छुरी
दिलों में बुग़्ज़ है भरा मगर लबों पे है हँसी
ज़बान पर ख़ुदा की रट दिलों में फ़िक्र-ए-शैतनत
ये अपने आप हैं ख़ुदा ग़रज़ को पूजते हैं ये
ये नफ़्स के ग़ुलाम हैं मफ़ाद के ग़ुलाम हैं
ये अपने आप मुक़तदी ये अपने ख़ुद इमाम हैं
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वो असर भरी नसीहत वो कलाम-ए-आरिफ़ाना
कि लगा रहा हो जैसे कोई दिल पे ताज़ियाना
जिसे काफ़िरी से रग़बत जिसे ज़ौक़-ए-मुल्हिदाना
उसे क्यूँ पसंद आए रह-ओ-रस्म-ए-मोमिनाना
है सितम की धुंद छाई है जफ़ा की फ़स्ल आई
है चमन पे ऐसा पहरा कि क़फ़स है आशियाना
मुझे याद आ रही हैं तिरी महफ़िलों की बातें
वो शिकायतों का दफ़्तर वो हिकायत-ए-शबाना
तिरे हुक्म से अलग हो तिरे नूर से जुदा हो
मिरी ज़िंदगी में बाक़ी नहीं ऐसा कोई ख़ाना
नज़र-ए-करम से मुझ को कभी देख ले वो शायद
मिरे दिल की आरज़ू है वो जमाल-ए-जावेदाना
है 'उरूज' ये सआ'दत ये है जेल की मसर्रत
कि तिहाड़ में अदा हो तिरी ईद का दोगाना
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आ गया वक़्त कि हो दावत-ए-आम ऐ साक़ी
भेज दे चारों तरफ़ अपना पयाम ऐ साक़ी
भेज दे चारों तरफ़ अपना पयाम ऐ साक़ी
खींच लाएगा हज़ारों को तिरे पास यहाँ
ये तिरा हुस्न-ए-नज़र हुस्न-ए-कलाम ऐ साक़ी
घर लुटाने की नहीं घर को बचाने की है फ़िक्र
किस क़दर इश्क़ है मेरा अभी ख़ाम ऐ साक़ी
कासा-ए-दिल है तिरे सामने उस को भर दे
मय-ए-अंगूर तो है मुझ पे हराम ऐ साक़ी
उन से बचना है तिरे लुत्फ़-ओ-करम पर मौक़ूफ़
हैं रह-ए-इश्क़ में फैले हुए दाम ऐ साक़ी
कब नए नज़्म से दुनिया को मिलेगी राहत
कितना मोहलिक है ये फ़र्सूदा निज़ाम ऐ साक़ी
दूर गोशे में है उफ़्तादा-ओ-दिल-गीर 'उरूज'
आ कभी उस की तरफ़ बादा-ब-जाम ऐ साक़ी
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ये दुनिया तो मिट जाने वाली है लेकिन
ज़मीं और भी आसमाँ और भी हैं
ये दुनिया तो इक ज़र्रा-ए-मुख़्तसर है
मकीं और भी हैं मकाँ और भी हैं
न तन्हा मिरा कारवाँ राह में है
रह-ए-इश्क़ में कारवाँ और भी हैं
न हो मुतमइन एक पत्थर हटा कर
कि रस्ते में संग-ए-गिराँ और भी हैं
अगर जी लगे आप का तो सुनाऊँ
फ़साने कई बर-ज़बाँ और भी हैं
कहो बिजलियों से कि बरसें मुसलसल
अभी बाग़ में आशियाँ और भी हैं
'उरूज' अपने गोशे से बाहर तो निकलो
कि बाहर हज़ारों जहाँ और भी हैं
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आप क्या जानें मोहब्बत का तमाशा क्या है
शो'ला-ए-इश्क़ किसे कहते हैं सौदा क्या है
शो'ला-ए-इश्क़ किसे कहते हैं सौदा क्या है
कोई ख़ुश है कोई ना-ख़ुश कोई शाकी तुझ से
कौन जाने कि तिरी बज़्म का क़िस्सा क्या है
साग़र-ए-महर-ओ-वफ़ा दौर में था सुब्ह-ओ-मसा
जाने अब मज्लिस-ए-अहबाब का नक़्शा क्या है
इल्म-ए-तक़दीर पे मौक़ूफ़ नहीं मेरा अमल
कौन जाने मिरी तक़दीर का लिक्खा क्या है
जिस के इमरोज़ में बाक़ी न रहे रूह-ए-हयात
साफ़ ज़ाहिर है कि उस क़ौम का फ़र्दा क्या है
जगमगाते ये सितारे ये फ़लक के खे़
में
'तू' ने पर्दे तो ये देखे पस-ए-पर्दा क्या है
कारसाज़ी पे ख़ुदा की है भरोसा वर्ना
मैं अगर जान लड़ाऊँ भी तो होता क्या है
सर हथेली पे लिए फिरते हैं जो लोग 'उरूज'
उन से पूछो कि मोहब्बत का तरीक़ा क्या है
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रात वो आए थे चेहरे से नक़ाब उल्टे हुए
मैं तो हैराँ था निकल आया किधर से आफ़्ताब
दिल पे उन के रू-ए-रौशन का पड़ा है जब से अक्स
दिल नहीं है बल्कि सीने में है रौशन माहताब
उन के दीवानों का इस्तिक़बाल है दार-ओ-रसन
खिंच गया जो दार पर उन के लिए वो कामयाब
क्या मिरी हम्द-ओ-सना और क्या मिरा शुक्र-ओ-सिपास
उन के एहसाँ बे-शुमार और उन की ने'मत बे-हिसाब
रात का पिछ्ला पहर था और आँसू की झड़ी
मेरा दिल था शायद उन की बारगह में बारयाब
इश्क़ की दुनिया में ऐसे हादसों से क्या मफ़र
आया क़ासिद का जनाज़ा मेरे ना
में का जवाब
ये महल मेरी तमन्नाओं का ऐ ‘अहमद-उरूज'
जैसे बच्चों का घरौंदा जैसे दीवाने का ख़्वाब
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मिरी आरज़ू की हुदूद में ये फ़लक नहीं ये ज़मीं नहीं
मुझे बज़्म-ए-क़ुद्स में दे जगह जो वहाँ नहीं तो कहीं नहीं
मुझे बज़्म-ए-क़ुद्स में दे जगह जो वहाँ नहीं तो कहीं नहीं
है जबीं तो असल में वो जबीं कि झुके वहाँ तो झुकी रहे
तिरे आस्ताँ से जो उठ गई वो जबीं तो कोई जबीं नहीं
मिरे दिल की नज़्र क़ुबूल कर जो इशारा हो तो ये सर निसार
कि वफ़ा-ए-अहद की शर्त में कहीं दर्ज लफ़्ज़ नहीं नहीं
ये अरब भी है मिरे रू-ब-रू ये अजम भी है मिरे सामने
मिरी जुस्तुजू को यक़ीन है कहीं तुझ सा कोई हसीं नहीं
तिरे कुंद तेशे से राह-रौ ये चटान कैसे कटे भला
तिरे हाथ यख़ तिरे पाँव शल तिरे दिल में सोज़-ए-यक़ीं नहीं
ये जो बंदगी है 'उरूज' की तिरी ज़िंदगी से है क़ीमती
न हो बंदगी तो फ़ुज़ूल है कोई वज़्न उस का कहीं नहीं
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ये इश्क़ की है राह न यूँ डगमगा के चल
हिम्मत को अपनी तोल क़दम को जमा के चल
हिम्मत को अपनी तोल क़दम को जमा के चल
राह-ए-वफ़ा है इस में न यूँ मुँह बना के चल
काँटों को रौंद रौंद के तू मुस्कुरा के चल
शम-ए-यक़ीं की लौ को ज़रा और तेज़ कर
ज़ुल्मत में रहरवों को भी रस्ता दिखा के चल
गर्दिश फ़लक की तेज़ है रफ़्तार तेरी सुस्त
मंज़िल है दूर अपने क़दम अब बढ़ा के चल
दुश्मन जो दोस्त के हैं वो नाराज़ हैं तो हों
सीने पे ज़ख़्म उन की जफ़ाओं का खा के चल
तीरों की बाढ़ आने दे अपने क़दम न रोक
उन की ख़ुशी यही है तू ख़ूँ में नहा के चल
बहता है ख़ूँ तो बहने दे बहने की चीज़ है
क़तरों से ख़ून-सुर्ख़ के गुलशन खिला के चल
हिम्मत के जाम सब्र के मीना से नोश कर
नक़्श-ए-क़दम से अपने तू रस्ता बना के चल
जलता रहे बस उस की तमन्ना का इक दिया
उस के सिवा हैं जितने दिए सब बुझा के चल
ऐ मीर-ए-कारवाँ तिरी ख़िदमत में अर्ज़ है
जो गिर रहे हैं राह में उन को उठा के चल
रस्ता कठिन है तू है बहुत ना-तवाँ 'उरूज'
सुल्तान-काएनात को हामी बना के चल
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मोहब्बत का ये भी कोई मरहला है
कि मैं नाला-ए-ना-रसा चाहता हूँ
निगाहों की इफ़्फ़त दिलों की तहारत
मैं सर से क़दम तक हया चाहता हूँ
तरद्दुद तवहहुम की ज़ुल्मत मिटा कर
मैं ईल्म-ओ-यकीं की ज़िया चाहता हूँ
मैं अख़लाक़-ओ-किरदार-ओ-रूहानियत में
तनज़्ज़ुल नहीं इर्तिक़ा चाहता हूँ
ख़ुदा की शरीअ'त हो नाफ़िज़ ज़मीं पर
मैं इंसानियत की बक़ा चाहता हूँ
है जन्नत तो तेरी रज़ा की अलामत
इलाही मैं तेरी रज़ा चाहता हूँ
'उरूज' उन का पैग़ाम पहुँचा तो मुझ तक
मगर मैं कुछ इस से सिवा चाहता हूँ
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न थी ज़बाँ को इजाज़त कि हाल-ए-दिल कहती
ज़बान-ए-अश्क से करती रहीं बयाँ आँखें
कभी छुपी है मोहब्बत कि मैं छुपा लेता
ज़बाँ जो बंद हुई बन गईं ज़बाँ आँखें
बनाओ दामन-ए-सादा पे इन से गुल-बूटे
क़ुबूल हो तो करूँ नज़्र ख़ूँ-फ़िशाँ आँखें
मैं अंदलीब हूँ फूलों की दीद मेरी हयात
परों को बाँध न कर बंद बाग़बाँ आँखें
शराफ़त-ए-निगह-ए-पाक का है निगराँ दिल
तहारत-ए-दिल-ए-मोमिन की पासबाँ आँखें
'उरूज' बढ़ के करो पेश दिल का नज़राना
तुम्हीं को ताक रही हैं वो दिल-सिताँ आँखें
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