तेरी साँसों का ज़ेर-ओ-बम जानम
तोड़ दे सब्र का भरम जानम
ये बदन कोई पुर-ख़तर रस्ता
फ़ित्ना-सामाँ है ख़म-ब-ख़म जानम
ऐसी नाज़ुक कमर कि जुलते हैं
बहती नदियों के पेच-ओ-ख़म जानम
तुम ने बस मुस्कुरा के देख लिया
लड़खड़ाने लगे क़दम जानम
इतनी मुद्दत के बा'द मिलती हो
हाल पूछोगी कम से कम जानम
— Yahya Khan Yusuf Zai















