kaash is khel men tu mere barabar aata | काश इस खेल में तू मेरे बराबर आता

  - Zahid Bashir

काश इस खेल में तू मेरे बराबर आता
मैं तुझे चूम के मैदान से बाहर आता

कम न पड़ती कभी मुझ को तेरी आँखों की सबील
ज़िन्दगी भर इसी दरबार से लंगर आता

तुम बहुत पहले पलट आए मेरे सहरा से
तुम इसे पार जो करते तो समुंदर आता

मेरी आँखों में कभी आता तेरे नाम का अश्क़
मेरी छत पर भी तेरी छत से कबूतर आता

कभी आवाज़ तो दे यार हमें मुश्किल में
और फिर देख मदद के लिए लश्कर आता

  - Zahid Bashir

Dosti Shayari

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