kis tarah hogaa fakeeron ka guzaara soche | किस तरह होगा फ़कीरों का गुज़ारा सोचे

  - Zahid Bashir

किस तरह होगा फ़कीरों का गुज़ारा सोचे
उस सेे कहना कि वो इक बार दुबारा सोचे

कैसे मुमकिन है उसे और कोई काम न हो
कैसे मुमकिन है कि वो सिर्फ हमारा सोचे

तेरे अफ़लाक पे जाए तो सितारा चमके
मेरे अफ़लाक पे आए तो सितारा सोचे

टूटे पतवार की कश्ती का मुक़द्दर क्या है
ये तो दरिया ही बताए या किनारा सोचे

ऐसा मौका हो कि बस एक ही बच सकता हो
और उस वक़्त भी एक शख़्स तुम्हारा सोचे

  - Zahid Bashir

Samundar Shayari

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