हम ज़रूर आऍंगे
कितनी नादानियाॅं कितनी फ़नकारियाॅं
सब समेटे हुए चल दिए हैं मगर
सुन लो शाम-ए-अवध
हम मिलें फिर अगर
तेरी पगडंडियों पे टहलते हुए
देख लेना ये तुझ से वा'दा रहा
इन दिनों की कहानी को दोहराऍंगे
तेरी गलियों में ख़ुशबू पिरोते हुए
हम यहाॅं से वहाॅं को निकल जाऍंगे
हम ज़रूर आऍंगे
हम ज़रूर आऍंगे
— zaid alif siddique















