तुम से कोई शिकायत नहीं
देखने की सियासत नहीं
चादरों में लपेटा हुआ
मैं किसी की भी हाजत नहीं
वापसी का तो इमकान है
पर किसी से रफ़ाक़त नहीं
तुम से मिल कर बदल तो गया
मुझ में कोई शराफ़त नहीं
मैं भला क्यूँ उसे देखता
मेरी उन से क़यादत नहीं
झड़ गए पत्ते एहसास के
अब किसी तौर उलफ़त नहीं
— Zohair Ahmad Sahil















