ख़ुद को हरदम सही समझती है
हँसने को फिर हँसी समझती है
लिखता हूँ बात दिल की मैं और वो
बात को शाइरी समझती है
दरिया पे बस पियासा आता है
वो मुझे बस वही समझती है
डूब कर आशिक़ी बताऊँगा
'इश्क़ की आशिक़ी समझती है
ज़िंदगी मैं जिसे समझता हूँ
ग़ैर को ज़िंदगी समझती है
मैं दिखूँ तो चिपकती है उसको
वो मुझे छिपकली समझती है
कहने को दोस्त हूँ ना मैं तेरा
सच बता दोस्ती समझती है
हाल मत पूछना तू सौरभ का
जीते जी ख़ुदकुशी समझती है
Read Full