बारहा दिल मचलता रहा रात भर
करवटें वो बदलता रहा रात भर
दास्ताँ में नया मोड़ आता रहा
हर क़दम मैं पिघलता रहा रात भर
ख़ूँ-शुदा लम्स ख़ल्वत में बसता गया
हर दफ़ा दम निकलता रहा रात भर
ख़ैरियत का दरीचा भी हिलता रहा
ज़लज़ला सा टहलता रहा रात भर
रास्ता देखती नींद तो सो चली
ख़्वाब ऐसा बहलता रहा रात भर
— kapil verma















