ये उजाला ग़म का आँखों में चमकता जाए क्यूँँ
ज़िंदगी फिर से मुझे इस मोड़ पर ले आए क्यूँ
और भी तो रंग भरने को हैं इस तस्वीर में
फिर मुसव्विर आज फीके रंग ही बिखराए क्यूँ
लोग जो पत्थर उठा लेते हैं हर इक बात पर
कोई उन के सामने फिर आइना रखवाए क्यूँ
भागता फिरता है यूँ तो वक़्त मेरे हाथ से
साथ हो तेरा तो ये चलने से भी कतराए क्यूँ
रात पर बस चाँद का ही राज चलता हो मगर
दिन में भी बाहर निकल कर वो भला इतराए क्यूँ
तुम तो कहते हो कि कोई ऐब मुझ
में है नहीं
हाल फिर मेरा अलग ये आइना दिखलाए क्यूँ
मेरे सीने पर सभी फ़िक़्रें सुकूँ से सोएँ तो
याद तेरी संग-दिल इनको जगाते जाए क्यूँ
— kapil verma















