ग़म-ए-जहाँ में मुझे कुछ तेरा ख़याल भी है
के शब की तीरगी में चाँद का जमाल भी है
हयात यूँँ तो हसीं है मगर ख़ुशी है गुम
ख़ुदा का शुक्र भी है उस से इक सवाल भी है
बहार चाँद सितारे बग़ीचे की ख़ुशबू
ये इब्तिदा है अभी हिज्र और विसाल भी है
असीर-ए-इश्क़ हूँ मैं हूँ ख़ुदी से भी आगाह
फ़राज़ सा भी हूँ इक़बाल जैसा हाल भी है
जगे थे दर्द-ए-शब-ए-हिज्र में वो भी आदिल
हमें सकूँ भी है इस दर्द का मलाल भी है
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