जहाँ में सबका है कोई हमारा तुम जहाँ जानाँ

तुम्हीं हो वादियाँ तुम गुलसिताँ तुम कहकशाँ जानाँ

मुझे मालूम है तुम को मुहब्बत ख़ौफ़ देती है
मगर ये भी मुहब्बत का है इक सख़्त इम्तिहाँ जानाँ

हवा से ख़ुशबू, गुल से रंग दिल से रंज-ओ-ग़म ये ख़त
गए थे तुम तो लेते जाते अपने सब निशाँ जानाँ

गँवाए दिन मुहब्बत के मुहब्बत को समझने में
दुबारा वक़्त क्या हम पर यूँ होगा मेहरबाँ जानाँ

छुपाएँ हैं इन्हीं में ग़म इन्हीं ग़ज़लों में रोया हूँ
अगर तुम पढ़ सको तो पढ़ लो मेरी सिसकियाँ जानाँ

ये पर्दा किस लिए है क्यूँ हमें अपना नहीं कहते
अभी तक फ़ासले क्यूँ हैं हमारे दरमियाँ जानाँ

मुझे भी लोग कहते थे के आदिल तुम तो अपने हो
मगर अब हम सफ़र कोई न कोई राज़दाँ जानाँ

— Aadil Hasan

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