वो मेरे ख़्वाब की लड़की जो गुम-शुदा है कहीं
उसी की खोज में ये दिल भी लापता है कहीं
ख़ुदा के वास्ते मत कीजिए ख़ुदा की बात
कई दिनों से कहीं मैं हूँ और ख़ुदा है कहीं
मुझे ये डर है निशाने पे दिल न हो उस का
कि मेरा तीर अँधेरे में जा लगा है कहीं
न जाने कब वो उठाएगा और तराशेगा
मेरे नसीब का पत्थर पड़ा हुआ है कहीं
जो बात बात पे कहता था गाँव जन्नत है
ख़बर मिली है वो अब शहर में बसा है कहीं
तेरे सभी सर-ओ-सामान से ये लगता है
तू इस मकान से पहले भी रह चुका है कहीं
इसी फ़िराक़ में हर शख़्स हो गया आदी
कि आशिक़ी से भी बढ़कर कोई नशा है कहीं
— Aditya Singh aadi














