ham khoj hi rahe the is zindagi ke saani | हम खोज ही रहे थे इस ज़िंदगी के सानी

  - Akash Rajpoot

हम खोज ही रहे थे इस ज़िंदगी के सानी
इतने में मिल गए तुम बन कर के ज़िंदगानी

छत पर वो आ गई है मौसम बदल रहा है
अब रंग खुल रहा है हल्का सा आसमानी

दोनों तरफ हमारी मुट्ठी भरी हुई है
इस हाथ में क़लम है उस हाथ में किसानी

कहते हैं आज उसने ग़लती क़ुबूल की है
सुनते हैं आज उसकी आँखें हुई हैं पानी

माँ-बाप के बुढ़ापे में काम ग़र न आए
किस काम का ये जीवन किस काम की जवानी

ये 'इश्क़ है हमारा बिजली का बिल नहीं है
हर बार टालते हो गढ़ कर नई कहानी

दुनिया ग़ज़ल हमारी सुनती रहेगी लेकिन
इक नज़्म आपको भी फ़ुर्सत में है सुनानी

तोहफ़े में जिसने मुझको छल्ला कभी दिया था
वो 'इश्क़ आख़िरी था वो आख़िरी निशानी

  - Akash Rajpoot

Kisaan Shayari

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