किरदार ये जो किसी नाटक का नहीं
ये खोटा सिक्का मेरी ग़ुल्लक का नहीं
है तेरी हसरत कि मुझ सा हो हम सफ़र
लेकिन सफ़र मेरा मंज़िल तक का नहीं
अब वक़्त तुझ पे कहाँ है मेरे लिए
और मुंतज़िर मैं भी अब दस्तक का नहीं
हो ख़ूब-सूरत मगर तुम मेरे कहाँ
चंदन हो लेकिन मेरे मस्तक का नहीं
आयत हुई पूरी लेकिन मत हो दुखी
अध्याय का अंत है पुस्तक का नहीं
— Amit Rajvanshi 'Guru'















