“लखनऊ”

अमाँ ये लखनवी लहजा हमारा
यही तहज़ीब का चर्चा हमारा
यहाँ हम तुम नहीं कहते किसी से
यहाँ है आप से रिश्ता हमारा

यही तहज़ीब का मरकज़ रहा है
नज़ाकत औ नफ़ासत से भरा है
यही तो शहर है इल्म-ओ-अदब का
चिकनकारी का भी डंका बजा है

अमीनाबाद का बाज़ार भी है
हुसैनाबाद मेरे यार भी है
ये हज़रतगंज तो है रूह इस की
ये उर्दू का तो ख़िदमत-गार भी है

ज़बाँ में जैसे मिश्री घोलती है
यहाँ सर चढ़ के उर्दू बोलती है
कि उस का लखनऊ से राब्ता है
हमारे दिल को जा कर खोलती है

असर असरार जैसे शाइरों ने
अदब औ शा'इरी के आशिकों ने
सजाया है इसे इल्म-ओ-अदब से
निराला और नागर लेखकों ने

— Prashant Arahat

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