"मेरा महबूब शाइ'र है"

सुना है वो सहेली को मेरी ग़ज़लें पढ़ाती है
ख़ुशी से ये बताती है मेरा महबूब शाइ'र है
पिरो कर लफ़्ज़ मोती से ग़ज़ल तैयार करता है
वो लड़का आज भी शिद्दत से मुझ को प्यार करता है

मेरी हर बात को वो नज़्म का हिस्सा बनाता है
कहीं रुख़सार मेरे या कहीं चश्मा बनाता है
कभी वो पूछता है क्या तेरे गालों में डिंपल है
वो शाइ'र है बहुत अच्छा मगर थोड़ा सा पागल है

सुना है इब्तिदा-ए-इश्क़ से ले कर अभी तक की
अधूरे प्यार की पूरी कहानी लिख रहा है वो
अजब है कैफ़ियत उस की अजब अंदाज़ हैं उस के
वो मिलता है तो बातों में ही दिन से रात करता है

कहा उस ने सहेली से कि उस की नौकरी हो तो
ये मुमकिन है कि घर वाले भी हों तैयार शादी को
ये फ़नकारी पे हावी हो गई है नौकरी जब से
मैं घर में कह नहीं सकती मेरा महबूब शाइ'र है

सुना है वो दु'आओं में हमेशा ये ही कहती है
ख़ुदावंद ऐ, मैं तेरी रहमतों पर नाज़ करती हूँ
मेरे आशिक़ मेरे शाइ'र पे इतनी मेहरबानी कर
उसे तू एक अच्छी सी अता अब नौकरी कर दे

— Prashant Arahat

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