भरी महफिल में मुझ को रुसवा कर के
मिला तुझ को भी क्या शर्मिंदा कर के
मेरा दिल अब सितमगर भर चुका है
नहीं है फ़ाइदा अब शिकवा कर के
परिंदे रहते हैं चुप चाप से अब
गया वो किस क़दर वीराना कर के
उदासी खा न ले नस्लें हमारी
न जाओ दूर ऐसे तन्हा कर के
मैं पहले इतना भी उजड़ा नहीं था
मुझे छोड़ा है उस ने सहरा कर के
भरोसा मुझ को ऐसे शख़्स पे था
कि जिस ने पेड़ काटा साया कर के
— Mohd Arham















