Azhar
Ghazal

के बेकसों के ग़मों का नहीं सहारा कोई

कतार में हो अगर तुम, नहीं तुम्हारा कोई

इसी गली से अभी गुज़रे हो के तन्हा हम
इसी गली में कभी होता था हमारा कोई

हुई जो सुब्ह पहुँचे दफ़्तरों की जानिब सब,
मुलाज़मत में फँसे और न है चारा कोई

असीर-ए-ग़म हैं मियाँ जाएँ हम किधर जाएँ
हमें तो दर्द से लगता नहीं है प्यारा कोई

किसी ने पूछ लिया हिज्र के मसाइल का
बिना हवा के करे जैसे बस गुज़ारा कोई

— Azhar

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