sukoot-e-shab dabochhe aur agle pal hi maare din | सुकूत-ए-शब दबोचे और अगले पल ही मारे दिन

  - Azhar

सुकूत-ए-शब दबोचे और अगले पल ही मारे दिन
यहाँ पहले पहल बस रात थी किसने उतारे दिन

कभी जब दिल रहा महरूम फुरसत में ख़यालों से
तो हमने भी मरम्मत करके मिसरों की गुज़ारे दिन

हुए जबसे बड़े ख्वाईश रही की लौट आएं बस
वो बेफ़िक्री में हँसते खेलते बचपन के सारे दिन

कहानी इब्तेदा-ए-इश्क़ की हमशक्ल है सबकी
लगे है चाँद जैसी रात लगते हैं सितारे दिन

हमें तो तीरगी में था सुक़ू अव्वल से आख़िर तक
चलो सब रात मेरे और रख लो तुम हमारे दिन

नमाज़ें भी शराबे भी कभी मोमिन कभी काफिर
मेरी रातों ने तेरी हिज्र में यूँं यूँं गुज़ारे दिन

हवा कुछ सर्द थी रंगो में वो थी और ख़ुशबू भी
दिखाए 'इश्क़ ने अज़हर हमें कितने ही प्यारे दिन

  - Azhar

Raat Shayari

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