Azhar
Ghazal

ग़म-ए-जिंदगी का असर रफ़्ता रफ़्ता

हुई ख़्वाइशे मुक्तसर रफ़्ता रफ़्ता

न ग़म हारने का न ख़ुश जीत से हूँ
बना हूँ मैं पत्थर मगर रफ़्ता रफ़्ता

रिहाई मिली पिंजरे से परिन्द को
डगर से कटे जब शजर रफ़्ता रफ़्ता

वही ग़म के क़िस्से वही बेकरारी
अज़ीयत से लिपटा सफ़र रफ़्ता रफ़्ता

है रोने की बातें हसे जा रहे हैं
है सीखा ये हम ने हुनर रफ़्ता रफ़्ता

रहे अच्छे लम्हों के क़ायम तकाज़े
दुवाएं हुई बे-असर रफ़्ता रफ़्ता

— Azhar

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