ग़म-ए-जिंदगी का असर रफ़्ता रफ़्ता
हुई ख़्वाइशे मुक्तसर रफ़्ता रफ़्ता
न ग़म हारने का न खुश जीत से हूँ
बना हूँ मैं पत्थर मगर रफ़्ता रफ़्ता
रिहाई मिली पिंजड़े से परिन्द को
डगर से कटे जब शजर रफ़्ता रफ़्ता
वही ग़म के किस्से वही बेकरारी
अज़ीयत से लिपटा सफर रफ़्ता रफ़्ता
है रोने की बातें हसे जा रहे हैं
है सीखा ये हमने हुनर रफ़्ता रफ़्ता
रहे अच्छे लम्हों के क़ायम तकाज़े
दुवाएं हुई बे-असर रफ़्ता रफ़्ता
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Azhar
our suggestion based on Azhar
As you were reading Travel Shayari Shayari