भूल जा उस को ज़माना तो ये सारा बोलता है

इश्क़ अब भी है निगाहों का इशारा बोलता है

बात ऐसी है कि इक वो शख़्स प्यारा बोलता है
हाँ मगर ग़ुस्से में उस के सिर पे पारा बोलता है

शाम होते रोज़ अपनी याद उस को भी सताती
लौट आओ उस नदी का वो किनारा बोलता है

झुर्रियाँ हैं भर गईं चहरे पे उस की याद में दास
सच कहा तू ने कि चहरे पे ख़सारा बोलता है

लोग कुछ भी कहते हों कहते रहें लेकिन अभी तक
बात हो गर प्यार की वो फिर तुम्हारा बोलता है
इश्क़ में वो शख़्स हर इक बात बच्चों सा बताता
और मैं समझूँ न तो आ कर दुबारा बोलता है

— Das Kanpuri

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