केवल मेरी बात समझते
इतना तो हज़रात समझते
नींद तुम्हें आती है वरना
होती है क्या रात समझते
अपनी आँखों से देखा था
वरना बे-बुनियाद समझते
उस की बात नहीं सुनते तो
कैसे उस की बात समझते
तुम को सब समझाया वरना
तुम तो दिन को रात समझते
— DEEPAK CHATURVEDI
इतना तो हज़रात समझते
नींद तुम्हें आती है वरना
होती है क्या रात समझते
अपनी आँखों से देखा था
वरना बे-बुनियाद समझते
उस की बात नहीं सुनते तो
कैसे उस की बात समझते
तुम को सब समझाया वरना
तुम तो दिन को रात समझते
Other ghazal from the same pen
Voices in the same orbit
Poetry by feeling