सब छोड़ जाएँगे मकाँ रह जाएँगे
कुछ ज़ख़्मों के दिल पे निशाँ रह जाएँगे
जिन पे ज़ियादा ही भरोसा है अभी
वो लोग भी कल बद-गुमाँ रह जाएँगे
ये जिस तरह से सिर्फ़ सुनते रहते हैं
सारे शजर ही राज़-दाँ रह जाएँगे
जैसा कहानी में मिरा किरदार है
हम इम्तिहाँ के दरमियाँ रह जाएँगे
तुझ से नहीं है मुनहसिर ज़िंदा-दिली
जब तक चमन हैं बाग़बाँ रह जाएँगे
— Dileep Kumar















