उस का यूँँ सब छोड़ जाना, ठीक है क्या?
फिर अकेले मुस्कुराना, ठीक है क्या?
बात जो अब तक छुपाई है सभी से
अब वही सब को बताना, ठीक है क्या?
याद में उस की ग़ज़ल जो इक कही थी
वो ग़ज़ल उस को सुनाना, ठीक है क्या?
रिश्ते जैसे भी हो, रहने दो, उन्हें यूँ
एक इक कर के मिटाना, ठीक है क्या?
ज़िंदगी का तजरबा तो कर लो पहले
यूँ अभी से हार जाना, ठीक है क्या?
— Dileep Kumar















