अपना ही एक मौसम लिए फिरते हैंलोग जो दिल को पुर-ग़म लिए फिरते हैंचारा-गर जैसे हैं ये सुख़न-वर सभीसबके ज़ख़्मों का मरहम लिए फिरते हैं— Dileep Kumar