एक पल में रूठ जाना यार का
ये वही क़िस्सा है पहले प्यार का
छैयाँ छैयाँ या हो बीड़ी की जलन
ख़ूब है अंदाज़ ये गुलज़ार का
थक गए हैं काम करते करते हम
आए अब जल्दी से दिन इतवार का
रहते हैं माता पिता के साथ हम
सो हमें ख़तरा नहीं है ख़ार का
सच्चे लोगों के लिए हैं गालियाँ
क्या यही दस्तूर है संसार का
मान लेगा वो तुम्हें अपना ख़ुदा
हाल मत पूछो कभी बीमार का
शहर छोड़ा है ये जब से यार ने
दाम सस्ता हो गया बाज़ार का
— Yash Sharma















