उड़े हैं ख़ूब ज़िम्मेदारी आने तक
सभी नादान होते हैं कमाने तक
छिपाने लग गए जज़्बात हम भी अब
नहीं आते हैं आँसू अब सिरहाने तक
फँसे हैं कितने पंछी इस हवा-ए-शहर
इन्हें पहुँचा दे कोई आशियाने तक
यहाँ है कौन अपना कौन ग़ैर आ देख
सभी बस साथ हैं अपने ठिकाने तक
नहीं होता लगाव आते हुओं से अब
नहीं लगता कोई अपना सताने तक
मिले हैं चाहने वाले मुझे कुछ पर
कहाँ महसूस होता है गँवाने तक
लगाता गजरा माशूका की ज़ुल्फ़ों में
मुहब्बत जो पहुँच पाता निभाने तक
बिना तनख़्वाह मैं इक नौकरी पर हूँ
भुलाना है उसे भी जान जाने तक
— Divu















