मेरे मतले का पहले मानी समझिए
कहीं जा के तब फिर रवानी समझिए
समझता कहाँ जज़्बा आँसू का कोई
सो बेहतर है आँखों का पानी समझिए
है बिखरा हुआ कमरा सालों से मेरा
इसी तर्ज़ पर ज़िंदगानी समझिए
नज़र आज आया जो हँसता ये चेहरा
इसे महज़ इक ना-गहानी समझिए
ठहरिए कभी पहलू में शाम के बा'द
सिमटती है कैसे जवानी समझिए
नहीं कहना कुछ भी किसी से हो जब भी
इशारा है ख़ामोशी या'नी समझिए
सजाया दिवू ने ग़ज़ल में तख़ल्लुस
मुकम्मल हुई इक कहानी समझिए
— Divu















