Divu

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Divu shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Divu's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

इक दफ़ा तो हाथ उस का छूटना भी चाहिए गर मुकम्मल इश्क़ है दिल टूटना भी चाहिए — Divu
इस लिए भाता नहीं शायद महीना ये मुझे जाँ गुफ़्तुगू कुछ आख़िरी उस सेे हुई थी फ़रवरी में — Divu
ढल गया साल ये भी धुएँ की तरह तू न आया न तेरी ख़बर तक कोई — Divu
ग़मगीन शख़्स से कुछ यूँँ राब्ता है मेरा जो खुल कर हँस लूँ तो उदास पड़ जाता हूँ — Divu
अब तो मिज़ाज-ए-शहर कुछ बदला सा लगता है दिवू जो दर्द बाँटोगे तमाशा ख़ुद-ब-ख़ुद बन जाएगा — Divu
किसी को चाहना और फिर अचानक से भुला देना बहुत मुश्किल रहा है ये सफ़र सब को बता देना — Divu
उम्र भर साथ रहने के वादे झूठे दावे वो करता है मुझ से — Divu
कि चाहत का मेरी पता भी नहीं वो मासूम है ये ख़ता भी नहीं — Divu
वो सुकूँ कहाँ दिखता अब तो प्यार में ज़ालिम जो नशा मिला तेरे इख़्तियार में ज़ालिम — Divu
जुस्तुजू में तेरी हर लम्हा रहा मैं शहर जो आया तेरे तन्हा रहा मैं — Divu
जुनून-ए-इश्क़ ने कैसा किया उस पर असर देखो क़दम भी चूमता है मेरा वो सर चूमने वाला — Divu
बेढंग सी ख़्वाहिश मेरे अंदर समाई बैठी है मैं तो कदी तेरा न होऊँ तू मेरा बन कर रहे — Divu
मैं ठहरने कैसे दूँ ख़ुशियों को चेहरे पर भला थोड़ा हँस लूँ तो उदासी रूठ जाती है यहाँ — Divu
ले के इक ख़्वाब आँखों में सोता हूँ रोज़ कह दूँ ऐसी ग़ज़ल जो ज़माना सुने — Divu
निगाहों से अदाओं से मेरी तुम जान लेते हो ये सारी झूठी है ता'रीफ़ें कैसे मान लेते हो — Divu
नाराज़गी नफ़रत न बन जाए कहीं मुझ को तेरा महबूब समझेगा जहाँ — Divu
अचानक मैं कभी सब उलझनों से दूर हो जाऊँ हमेशा की तरह सोऊँ हमेशा को ही सो जाऊँ — Divu
उस का हुआ क्या हाल ये राह-ए-सफ़र से पूछ तू वो मुंतज़िर है क्या ही जाने मुंतज़र से पूछ तू — Divu
दो दिन की कहानी में नायाब रहा हूँ मैं पागल सी किसी लड़की का ख़्वाब रहा हूँ मैं — Divu
कहीं तो मैं किसी से सीख लेता रस्म दुनिया की मुहब्बत में मुहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं सोचा — Divu

Ghazal

छोड़ा है घर अपना किसी ने फिर कमाने चल पड़ा उस को नहीं है कुछ ख़बर क्या क्या गँवाने चल पड़ा रौनक़ नहीं होती है त्यौहारों पे आ घर मेरा देख स्टेटस लगा कर फ़ोन पर अपने सिरहाने चल पड़ा बीमार होगा बाप उस का पर बताएगा नहीं सोचा था कैसे फ़र्ज़ अब कैसे निभाने चल पड़ा आँसू लिए आँखों में कब तक राह देखेगा कोई थक हार कर महबूब भी ग़ैरों के शाने चल पड़ा ये शहर कब किस का हुआ है सब को अपनाता है ये अपना पराया जान किस पे हक़ जताने चल पड़ा जब भीड़ में तन्हा दिखेगी ज़िन्दगी सोचेगा तब क्या चाहिए था ज़िन्दगी से क्या ही पाने चल पड़ा — Divu
इस उम्र में जवानी ऐसे मचल रही है हर इक क़दम पे अब तो हसरत बदल रही है समझा रहा हूँ ख़ुद को पर कब तलक बचूँगा ये मोम सी हया अब अंदर पिघल रही है ख़ामोश सर्द रातें उस पे बयार की चोट सुन पर गई हथेली ख़्वाहिश भी जल रही है है नींद भी गँवाई अब चैन भी कहाँ है ली सुब्ह तक है करवट बस रात टल रही है कोई तो अब हो अपना जो इन लबों को चू में ये जुस्तुजू भी अब तो मुश्किल सँभल रही है कोई क़रीब आए कुर्बत में तो बुलाए प्यासी ये आरज़ू है बेकल टहल रही है हो सब्र मुझ में बेशक है इंतिज़ार मुश्किल बाहों की है ज़रूरत निय्यत फिसल रही है ग़फ़लत में है जवानी और ख़ुद-कुशी की चाहत ऐसी ही ज़िंदगी तो सालों से चल रही है — Divu
दूर ज़रा रह लूॅं तो उदास पड़ जाता हूँ उसे नज़र भर लूॅं तो उदास पड़ जाता हूँ अंदर ही अंदर घुटने की आदत है अब किसी से कुछ कह लूॅं तो उदास पड़ जाता हूँ क़ैद में लगती है पिंजरे सी मेरी दुनिया हवा में गर बह लूॅं तो उदास पड़ जाता हूँ भर दो अख़बार सारा बिखरे सब रिश्तों से अच्छी ख़बर तक लूॅं तो उदास पड़ जाता हूँ रहने दो मुझ को इन उदास शे'रों में ही कुछ अच्छा लिख लूॅं तो उदास पड़ जाता हूँ क़रार कुछ ऐसा है तन्हाई से मेरा लोगों से मिल लूॅं तो उदास पड़ जाता हूँ बैठा है इक ग़मगीन शख़्स मेरे अंदर जो खुल कर हँस लूॅं तो उदास पड़ जाता हूँ — Divu

Nazm

"तन्हाई" ख़ुद को इक कमरे में बाँध रखा है मैं कुछ हूँ दुनिया ने कुछ मान रखा है मुझ सेे मिलने मेरे कमरे आओ मुझ को कस कर अपने गले तो लगाओ गूँजती कमरे में आवाज़ बहुत है इन ख़ामोश लबों की बात बहुत है अंदर से हँसना भूल चुका हूँ शायद खुल के रोना भूल चुका हूँ शायद बाहर तन्हाई से निकालो कोई लग के गले मुझ को रुला दो कोई अकेले हिम्मत यहाँ कहाँ से लाऊँ अपने आँसू को आख़िर कैसे जुटाऊँ मुझ पे मगर ये अपनी अना भारी है हँसने हँसाने की ज़िम्मेदारी है मैं कब किसी से अपनी बात कहूँगा या तन्हाई के ही साथ रहूँगा जाने कब से झूठी सी आस में हूँ एक फ़रिश्ते की मैं तलाश में हूँ कोई तो कमरे से बाहर लाएगा फिर से ख़ुद से मुझ को मिलवाएगा मैं जो हूँ बन कर बाहर आऊँगा सब को ख़ुद से कभी तो मिलवाऊँगा — Divu