मैं ने कब चाहा कि मुझ को ये ज़माना समझे
तू मगर दिल को मिरे अपना ठिकाना समझे
बात करना या न करना ये तिरी मर्ज़ी है
थक के जब लौटे तो काँधे को सिरहाना समझे
बस मुहब्बत ही नहीं थोड़ी तो तकरार भी हो
आँसू को मेरी तरह तू भी ख़ज़ाना समझे
रूठ कर मैं कभी गर तुझ से जो बातें न करूँ
ले चले साथ मुझे मेरा बहाना समझे
जिस फ़साने पे टिकी है मिरी सारी ग़ज़लें
उस फ़साने को तू भी अपना फ़साना समझे
— Divu















