Divu
Divu
Ghazal

शराफ़त में लगे इल्ज़ाम के ख़ातिर

हुए बदनाम किस के नाम के ख़ातिर

शरारत को मुहब्बत मान बैठे हम
तरसते रह गए इक गाम के ख़ातिर

रहे बढ़ते क़दम उस इक इशारे पर
नहीं मालूम किस अंज़ाम के ख़ातिर

मुहब्बत ने किया क्या हाल ये देखो
रहे हम मुंतज़िर आलाम के ख़ातिर

नहीं हम जा सके जिस के बुलावे पर
तरसते हैं उसी पैग़ाम के ख़ातिर

— Divu

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