शराफ़त में लगे इल्ज़ाम के ख़ातिर
हुए बदनाम किस के नाम के ख़ातिर
शरारत को मुहब्बत मान बैठे हम
तरसते रह गए इक गाम के ख़ातिर
रहे बढ़ते क़दम उस इक इशारे पर
नहीं मालूम किस अंज़ाम के ख़ातिर
मुहब्बत ने किया क्या हाल ये देखो
रहे हम मुंतज़िर आलाम के ख़ातिर
नहीं हम जा सके जिस के बुलावे पर
तरसते हैं उसी पैग़ाम के ख़ातिर
— Divu















