पूछो जुदाई का दिन अब की अजल कहूँगा
इस बार इश्क़ अपना बेहद सरल कहूँगा
अपनों के छाँव से है हर आदमी की बरकत
तू साथ मेरे जो है ये घर महल कहूँगा
जो है उदास ग़ज़लें मशहूर हो गईं पर
अब महफ़िलों में मैं भी कुछ मीठे पल कहूँगा
मेरी जो उँगलियाँ हैं हर लट सँवार देगी
लूँगा बदन पे बोसा हर दिन ग़ज़ल कहूँगा
आँखें तेरी मुझे अब उलझाने लग गई है
इतनी हसीन उलझन इस को मैं हल कहूँगा
महबूब लिपटा है यूँ बाहों के दरमियाँ जो
अब कैसे होगा मुमकिन अब शे'र कल कहूँगा
— Divu















