दूर ज़रा रह लूॅं तो उदास पड़ जाता हूँ
उसे नज़र भर लूॅं तो उदास पड़ जाता हूँ
अंदर ही अंदर घुटने की आदत है अब
किसी से कुछ कह लूॅं तो उदास पड़ जाता हूँ
क़ैद में लगती है पिंजरे सी मेरी दुनिया
हवा में गर बह लूॅं तो उदास पड़ जाता हूँ
भर दो अख़बार सारा बिखरे सब रिश्तों से
अच्छी ख़बर तक लूॅं तो उदास पड़ जाता हूँ
रहने दो मुझ को इन उदास शे'रों में ही
कुछ अच्छा लिख लूॅं तो उदास पड़ जाता हूँ
क़रार कुछ ऐसा है तन्हाई से मेरा
लोगों से मिल लूॅं तो उदास पड़ जाता हूँ
बैठा है इक ग़मगीन शख़्स मेरे अंदर
जो खुल कर हँस लूॅं तो उदास पड़ जाता हूँ
— Divu















