"तन्हाई"
ख़ुद को इक कमरे में बाँध रखा है
मैं कुछ हूँ दुनिया ने कुछ मान रखा है
मुझ से मिलने मेरे कमरे आओ
मुझ को कस कर अपने गले तो लगाओ
गूँजती कमरे में आवाज़ बहुत है
इन ख़ामोश लबों की बात बहुत है
अंदर से हँसना भूल चुका हूँ शायद
खुल के रोना भूल चुका हूँ शायद
बाहर तन्हाई से निकालो कोई
लग के गले मुझ को रुला दो कोई
अकेले हिम्मत यहाँ कहाँ से लाऊँ
अपने आँसू को आख़िर कैसे जुटाऊँ
मुझ पे मगर ये अपनी अना भारी है
हँसने हँसाने की ज़िम्मेदारी है
मैं कब किसी से अपनी बात कहूँगा
या तन्हाई के ही साथ रहूँगा
जाने कब से झूठी सी आस में हूँ
एक फ़रिश्ते की मैं तलाश में हूँ
कोई तो कमरे से बाहर लाएगा
फिर से ख़ुद से मुझ को मिलवाएगा
मैं जो हूँ बन कर बाहर आऊँगा
सब को ख़ुद से कभी तो मिलवाऊँगा















