रात को दिन में बदलते देखा है
आँख में दरिया डुबा के देखा है
जिस नज़र से ख़्वाब देखे जाते थे
उस नज़र से ख़ूँ टपकते देखा है
ज़िन्दगी से लड़ते वो मारा गया
ज़िन्दगी से जिस को लड़ते देखा है
अपनी उल्फ़त पर गुमाँ इतना न कर
अच्छे अच्छों को बिछड़ते देखा है
मैं किसी को ज़ख़्म क्यूँ दिखलाऊँ अब
देखने से ज़ख़्म भरते देखा है
— Furkan Ansari















