सूरज-मुखी के फूल सा सूखा हुआ मुझे
मैं देख कर के रो पड़ा फेंका हुआ मुझे
वो कौन है मैं जिस के लिए बन गया रक़ीब
है कौन जिस का मिल गया माँगा हुआ मुझे
अब उस से क्या गिला मुझे क्या उस से वास्ता
जो छोड़ कर के चल दिया रोता हुआ मुझे
मैं मुस्कुरा रहा हूँ मगर मुझ से पूछिए
मैं क्या छिपाना चाहता हूँ क्या हुआ मुझे
मैं चाहता हूँ मेरे मुसव्विर बना तूँ आज
तस्वीर जिस
में चाँद हो तकता हुआ मुझे
वो मेरे पास बैठी है हाथों में हाथ है
रहने दो थोड़ी देर यूँ खोया हुआ मुझे
ख़ुशबू बिखेरते हुए गुज़रा है पास से
इक फूल भीड़ में अभी छूता हुआ मुझे
मालिक तू मेरे हाल पे थोड़ी तरस तो खा
तुझ को तो सारा इल्म भी है क्या हुआ मुझे
मैं जा रहा हूँ छोड़ के दुनिया जहाँ को आज
तुम मुस्कुराना सुन के यूँ नग़्मा हुआ मुझे















